भारत एकादश में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण हो


हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं और हर जगह महिलाएं बराबरी का टक्कर दे रही हैं। तब फिर आखिर क्रिकेट टीम में महिलाओं की भागीदारी क्यों नहीं? टीम एकदश में 6 पुरुश और 5 महिलाएं हों, तो कैसा होगा? वैसे महिलाएं घर- बाहर हर किसी को अपने पीछे नचा सकती हैं, तो फिर पिच पर गेंद को क्यों नहीं? शारीरिक दृश्टिकोण से यह हो सकता है कि युवराज और युसुफ की ऊंचाई वाला छक्का न मार सकें, पर विकेट पर तो अवश्‍य ही टिकी रह सकती हैं। नारी धैर्य की प्रतिमूर्ति हैं। पिच पर स्त्रियों का धैर्य बहुत ही काम आ सकता हैं। ‘आया राम-गया राम’ वाली स्थितियां तो नहीं ही होंगी। टीम में राहुल द्रविड़ की कम ही कमी खलेगी। कुल मिलाकर अगर भारतीय टीम में महिलाओं को शामिल कर क्रिकेट के एक नये फोरमेट का परिचय विश्‍व क्रिकेट में तो हो ही जायेगा। क्रिकेट मर्दों का खेल था चैके और छक्के मर्दानगी के प्रतीक थे। महिलाओं की भूमिका कम ही थी। 1930 में काठियावाड़ा में महिलाएं क्रिकेट खेलती नजर आईं। क्रिकेट जबसे मैंने देखना समझना शुरू किया, महिला की चर्चा क्रिकेटरों से दिल्लगी तक की ही रही। इमरान, मोहसिन खान, अजय जडेजा और कमोबेश सभी खिलाड़ियों पर फिल्मी हीरोइनों का फिदा होना आम कहानी रही है। कुछ हीरोइन क्रिकेटरों का लय बिगाड़ने में बदनाम भी हुईं। पवेलियन में बैठी प्रेमिका के लिए खेलने वाले क्रिकेटरों को दर्शकों ने खूब कोसा। मंदिरा बेदी ने मर्दों के उस खेल में विधिवत पदार्पण किया और एंकर बनी। आईसीसी के चैम्पियनशिप (कोलम्बो) में मंदिरा जब दिखी तो काफी हाय तौबा हुई। क्रिकेट के बदलते चेहरे पर विमर्श शुरू हो गया। बाजार के विकास के साथ-साथ क्रिकेट और कमसीन काया का गठजोड़ हुआ। 2003 के विश्‍वकप में महिला दर्शकों की भागीदारी 2.2 करोड़ की रही, जो कुल दर्शकों का 46 प्रतिशत था। बाजार को पैसा चाहिए। उसे क्रिकेट से कोई लेना-देना भी नहीं था। आईपीएल और आईसीएल की शुरूआत हुई। स्त्री-देह के बिना क्रिकेट की शोभा भी बढ़ने वाली कहां थी? स्त्री-देह का जितना भद्दा इस्तेमाल हो सकता था, बाजार ने किया। क्रिकेट में शोहरत और संसाधन का खेल जब परवान चढ़ा, तो शरीर से ज्यादा क्रिकेट में सेक्स की मांग बढ़ गई। भारतीय टीम के कोच ने प्रस्ताव रखा कि खिलाड़ी मैदान में उतरने के पूर्व सेक्स का आनन्द लें। सेक्स मस्तिश्क को राहत देता है और इससे खिलाड़ियों पर बेहतर असर होगा। क्रिस्टन ने यद्यपि उस प्रस्ताव पर अपनी सफाई भी दी कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा, बावजूद सेक्स और क्रिकेट का आपस में युग्म तो बन ही गया। इस युग्म का ही नतीजा था कि थरूर भी अपनी प्रेमिका के पदार्पण का मोह नहीं तज पाए। बहरहाल, क्रिकेट और कमसिन काया का गठजोड़ तो ही गया है। रब ये जोड़ी सलामत रखे।

-चन्दन झा/खुशबू

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