आधुनिक व प्रगतिशील समाज के नाम पर धब्बा हैं खाप पंचायतें


जाति प्रथा पोषक खाप पंचायतें हमेशा ही गलत कारणों चर्चा में रही है। समाज के कई उथल पुथल के इनकी महती भूमिका रहती है। पुराने विचारों-मूल्यों पर आधारित तथा समाज के उच्च वर्ग द्वारा पोषित यह पंचायतें अक्सर संवैधानिक मूल्यों स्वतंत्रता समानता के विरूद्ध खड़ी दिखती है। खाप पंचायतें हरियाणा के इलाकों में बहुत अधिक प्रभावी है। प्रमुखतः जहां दलित-विरोधी अत्याचार होते हैं या जहां दलितों का मात्र इसलिए संहार कर दिया जाता है कि उन्होंने गाय मार दी। यह महज संयोग नही है कि झज्जर के नजदीक ऐसी ही एक घटना कुछ साल पहले घटी थी। बीते अप्रैल महीने में मनोज और बबली की नृशंस हत्या ने सबको झक झोर कर रख दिया था। यह देश के कई हिस्सों में फैली मानसिक संकीर्णता का प्रतीक है। मनोज और बबली एक ही गोत्र के थे, दोनों ने प्रेम विवाह किया था और समाज के डर से और अपने जीवन की रक्षा के लिए उन्होंने न्यायालय की शरण भी ली। अदालत से लौटते हुए पुलिस कार्मियों की उपस्थिति में कुछ लोग उन दोनों के जीप में उठाकर ले गए और इसके बाद इस जोड़े की नृशंस हत्या कर दी गई। हत्यारे उसी गांव के थे। मुख्य अभियुक्त पंचायत का प्रधान था। न्यायालय ने पांच को फांसी, एक को उम्र कैद तथा एक अन्य को सात साल कैद की सजा सुनाई है। बजाय कि घटना पर क्षोभ व्यक्त करने के खाप पंचायत के लोग और ही उग्र होकर बयान दे रहें है कि आगे भी मनोज और बबली के नक्षे कदम पर चलने वाले युवाओं के साथ ऐसा ही होगा। इस नृशंस और अमानवीय घटना के पहले भी सैकड़ों युवा लोग इन पंचायतों के शिकार हो चुके हैं। इन पंचायतों की मांग है कि हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन कर यह लिखा जाना चाहिए कि समान गोत्र के लड़का-लड़की विवाह नहीं कर सकते। ये घटनाएं उन तमाम मुस्लिम परिवारो की तरह है जहां समाजिक बंधनों को नकारकर आपनी इच्छा से विवाह करने वाले जोड़ो को मार डाला गया। इन हत्याओ को आॅनर किलिंग का नाम दिया जाता है। इनका कहना है कि लड़के या लड़की के विवाह का फैसला उसके परिवार और समाज द्वारा होना चाहिए अन्यथा ऐसे जोड़ो की हत्या न्यायजन्य है। ऐसी कई घटनाएं पाकिस्तान के कईं इलाकों से सुनने को मिलती है। यह घटनाएं समाज में गहराई से समाई हुई जाति वर्ण की मानसिकता की घोतक है। ये प्रथा हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई सभी समाजों में व्याप्त है। जातिगत तथा लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करने की आवाज समय- समय पर उठती रही है। हमारे संविधान मे भी इन्हें समाप्त करने पर पूरा जोर दिया गया है। जब डा. अम्बेड कर ने हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत किया था और उसमें स्त्री-दलित स्वतन्त्रता समानता का प्रयास किया तब भी वाम पंथी मानसिकता वालो ने विरोध किया था। तब नेहरू ने कहा था ‘हमारा संविधान प्रगतिशील है, लेकिन समाज आज भी पुराने ढकोंसलों में जकड़ा हुआ है।’ यह जकड़ कुछ कम तो हुई है, लेकिन मनोज-बबली जैसी घटनाएं आज भी समाज की प्रगतिशीलता के मुंह पर कलंक है।


-अमित तिवारी


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