शिक्षित युवक पथ भ्रमित क्यों


आज हमारे देश के युवा पढ़-लिख कर भी अपना कदम अपराध की ओर बढाने से नहीं रोक पा रहे है। आखिर इसके क्या कारण है । पहले अज्ञानता तथा गरीबी को ही अपराध का जननी माना जाता था, अब जो देखने को मिल रहा है वह ठीक इसके विपरीत है। आज पढे-लिखे एवं धनवान घर के युवक की संख्या अपराध करने वाले व्यक्तियों में अधिक पाया जा रहा है, सड़क पर कार की लूट हो या बैंक डकैति, बटला हाउस इनकाउन्टर हो या फिर गी्रन पार्क इनकाउन्टर सभी में मरने वाले युवक पढ़े-लिखे एवं धनी घर से तालूकात रखते थे। इस विषय पर जब अध्‍यन किया गया तो यह बात सामने आई की हमारे शिक्षा पद्ध़ति में ही चूक है। आज हमारे शिक्षा की नींव ही कमजोर पर रही हैं।शिक्षा जीवन के सर्वागीण विकाश का अमोध अस्त्र है शिक्षित मनुष्य अपने ज्ञान दीप से जीवन की राहों का अंधेरा दुर कर लक्ष्य की ओर हमेशा अग्रसर रहता है आज के वैज्ञानिक युग में शिक्षा ही वह धन है जिसका पूंजी के रूप मं प्रयोग कर हम विकाश के द्वार को खोल सकते है। अगर शिक्षा प्रणाली वैज्ञानिक तथा व्यवाहारिक हो तभी हम विकास की मंजिल तक पहुंच सकते है। अगर पथ ही गलत दिशा में जाता हो तो पथिक अपनी मंजिल तक कैसे पहुंच सकता है। इस से हमारी शिक्षा पद्वति दोष पूर्ण है, हमारी वेशिक शिक्षा में नित नये कदम तो इसे और खोखला कर रही है । आप आठवी तक अब बिना पढ़े ही पास हो सकते है, क्योकि यह फैसला शिक्षा मंत्री एवं उनके सहयोगी द्वारा लिया गया है जब नींव ही कमजोर पडे़गी तो इस पर खड़ी ईमारत का क्या भरोसा, हमारी वर्तमान शिक्षा पद्वति में व्यवहारिकता का भी अभाव है केवल किताबी ज्ञान देने से कोई भी ज्ञानी नहीं हो सकता, यही कारण है कि बिजली की सारी जानकारी पढ लेने के बाद भी फ्यूज उड़ जाता है। शिक्षित होने के बावजूद शिक्षा में व्यवहारिकता एवं मानवहित रहित शिक्षा के अभाव के कारण युवा पढ़-लिख कर भी अपराध करने से अपने आप को नहीं रोक पा रहे है। वर्तमान शिक्षा पद्वति हमें झुठे अहंकार और कर्म विमुखता की ओर ले जाती है, एक उच्च डिग्रीघारी व्यक्ति अपने को बहुत बड़ा वि़द्वान होने का दंभ भरता है, व साधारण कार्य करना अपने इज्जत प्रतिष्ठा के विरूद्ध समझता है।यदि शिक्षा देने के समय ही उसे व्यवहारिक रूप में साधारण कार्य की ओर उन्मुख किया जाए तो निश्चय ही यह झुठा अहंकार टूट जाऐगा। और कर्म विमुखता समाप्त हो जाऐगी, यदि इसी तरह की शिक्षा मिलती रही तोंब यह हमारे चरित्र निर्माण में सहायक नहीं हो सकता, इस तरह की शिक्षा से ना तो हम व्यक्ति के चरित्र का सही निर्माण कर सकते ना ही राष्ट्र का, आज के युवक पर यह पंक्ति पूर्णतःसही बैठती है।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर,
पंछी को छाया नहीं फल लागे अतिदूर ।
आज के युवक पढ़-लिख कर भी अपने निजी स्वार्थ के चलते देश की मान मर्यादा एवं सांस्कृति को कुचल रहे है। शिक्षित व्यक्ति का यह बर्ताव है तो फिर अनपढ़ व्यक्ति को कूछ कहना तर्क संगत नहीं लगता।

-संजय मिश्रा

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