भाजपा की सिर्फ चाल बदली चिंतन और चरित्र वही पुराना


भाजपा का तेवर हुआ तल्ख नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा की चाल में बदलाव आया है, पर चरित्र और चिंतन पुराना ही है। भाजपा के जानदार चेहरे वाजपेयी और आडवाणी युग का अवसान हो चुका है। सदन और सदन के बाहर जो नया चेहरा सामने आया है उसके आधार पर भाजपा अपनी नई पहचान बनाने में लगी है। राष्ट्रीय टीम की घोषणा के बाद असंतुश्टों का जो विरोध गडकरी के सामने था, वह थमता सा नजर आ रहा है। बिहार में पार्टी ने नेतृत्व परिवर्तन किया। गुटबाजी में फंसी बिहार भाजपा को बाहर निकालने का भरपूर प्रयास हुआ है। चर्चित डाॅ. सी. पी. ठाकुर को अध्यक्ष, सुखदा पांडेय को राश्ट्रीय उपाध्यक्ष और अश्विनी चैबे को राष्ट्रीय परिषद का सदस्य बनाकर सबों को खुश किया गया है। उत्तर प्रदेश में लगातार जानाधार खो रही पार्टी को मजबूती देने के लिए रूठे को मनाने का खेल चल रहा है। उमा भारती को फिर से पार्टी में लाने तथा उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी देने की कवायद शुरू हो गई है। ब्राह्मण मतदाता को पार्टी से जोड़े रखने के लिए कलराज मिश्रा का ओहदा बढ़ाया गया है। दिल्ली भाजपा में भी नया प्रयोग हो रहा है। पार्टी को एक नये चेहरे की तलाश है जो सबों को साथ लेकर चल सके। सांगठनिक स्तर पर पार्टी हर ओर बदलाव कर रही है। भाजपा का सघंर्शषील चेहरा खत्म ही हो गया था। पिछले अघ्यक्षों ने जो भी काॅल दिया, वह बेअसर ही था। गडकरी भाजपा को जो नयी पहचान देना चाहते हैं वह अब धीरे-धीरे सामने आने लगी है। पार्टी ने मंहगाई के खिलाफ दिल्ली घेरने की योजना बनाई और इसके तहत 21 अप्रैल को एक विशाल प्रदर्शन हुआ। देशभर के भाजपा कार्यकर्ता दिल्ली आये। कम से कम दो लाख से ज्यादा की भीड़ थी। लगातार जनाधार खोने वाली भाजपा के भीतर नई जान आई। इस प्रदर्शन से यह साबित करने की कोशिश की गई कि पार्टी जनहित के लिए हर कुछ करने को तैयार है। सड़क पर पार्टी तो सफल हुई, पर सदन में आकर पार्टी पिछड़ गई। महंगाई के मुद्दे पर पार्टी विपक्षी दलों का सूत्रधार नहीं बन सकी। पार्टी के ही सांसद ने व्हिप का उल्लंघन किया। भाजपा ने झारखंड में सरकार की शहादत दे दी, शिबू सोरेन की सरकार से समर्थन वापस ले लिया। खबर लिखने तक झारखंड सरकार बचाने का खेल जारी है। पुराने स्वयंसेवक रहे बाबूलाल मंराडी पर दाव खेला जा रहा है। इधर कांग्रेस भी नहीं चाहती की मंराडी फिर से भाजपा की ओर जाएं। बहरहाल, पार्टी यह शो कर रही है कि किसी भी कीमत पर वह विश्‍वासघात या पार्टी विरोधी गतिविधियों को बर्दाश्‍त नहीं करेगी। परन्तु ध्यान देने की बात ये है कि पार्टी की चाल भले ही बदल रही हो पर चिंतन और चरित्र वही पुराना है। पार्टी महंगाई के मुद्दे पर कांग्रेस को घेर रही है वह भी सावधानी से। पार्टी कांग्रेस की आर्थिक नीति का विरोध नहीं कर रही है। वह तो आर्थिक नीति को डाॅक में खड़ा करने के बजाय ‘कुप्रबंधन’ शब्द का इस्तेमाल कर रही है। मूलतः भाजपा और कांग्रेस आर्थिक नीति के मामले में बिल्कुल एक हैं। दोनो ही पार्टियां बाजारवाद की पक्षधर हैं। भाजपा और कांग्रेस एक ही आर्थिक मंच पर खड़ी हों तो फिर तीसरे मोर्चे की क्या बिसात? महंगाई पर आवाज का ना बुलंद होना भाजपा की नीतिगत खोट है। यह सत्य है कि वैष्‍वीकरण के पूर्व कीमतों पर राजनीति का नियंत्रण था। महंगाई पहले भी थी, पर वह बिल्कुल तात्कालिक थी। फसलों के दाम बढ़ते तो थे, पर नई फसल आते ही दाम घट जाते थे। बाजार की गुलाम रही भाजपा दाम बांधने की स्थिति में नहीं है। यद्यपि भाजपा पर पुराना ठप्पा लगा ही है कि यह ब्राह्मण और बनियों की पार्टी है। ‘ब्राह्मणवाद’ और ‘बाजारवाद’ जैसे दो जहर पास हों, तो मरने के लिए अतिरिक्त जहर की क्या जरूरत है? भाजपा की एक हथेली पर ब्राह्मणवाद और दूसरी हथेली पर बाजारवाद है। बाजार ने अपने हिसाब से सरकार बनाई और विपक्ष भी। 21 अप्रैल को हुए बड़े प्रदर्शन में देश को उम्मीद थी कि पार्टी जन विरोधी आर्थिक नीति की मुखालफत करेगी, पर ऐसा नहीं हुआ। आज जन विरोधी का अर्थ है, धन विरोधी होना। भाजपा भला क्यों धन विरोधी होना चाहेगी। झारखंड सरकार में शामिल भाजपा बहुत ही असहज थी कि उन्हें नक्सल समर्थित जन प्रतिनिधियों के साथ बैठना पड़ रहा था। कटौती प्रस्ताव पर सोरेन का विश्‍वासघात जितना बड़ा कारण नहीं था उससे बड़ा कारण था सोरेन सरकार में शामिल वह नक्सली जो जल, जंगल और जमीन की बात कर रहे हैं। भाजपा तो शागीर्द है उन पूंजीपतियों की जो आम गरीब आदिवासियों की जमीन हड़पना चाहते हैं। देश भाजपा एवं अन्य पार्टियों से महंगाई के खिलाफ एक लड़ाई की अपेक्षा करता है और यह तभी संभव है जब विकास के माॅडल और नई आर्थिक नीतियों के प्रयोग और परिणामों को देखते हुए फिर से विमर्श हो और एक वैकल्पिक आर्थिक माॅडल को देश के सामने रखा जाय।



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