मांस निर्यात हो प्रतिबंधित

देश में विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ रहा है। विदेशी मुद्रा लाने में एक बड़ा योगदान बेजुबान भैंसो और मवेशीयों का भी है। चैंक गए? चैंकिए मत! यह सच है। विदेशी मुद्रा भण्डार में आई हुए मुदा्र का एक भाग अपने ही दुधारू मवेशियों के खून से भीगा हुआ होता है। पश्‍िमी उत्तर प्रदेश में मास निर्यात का बड़ा कारोबार हो रहा है। इसका सर्वाधिक शिकार दुधारू मवेशी हो रहे है। मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, अलीगढ़, नोएडा आदि के कसाई घरों में खड़ी भैंसें 150-200 रु किलो के भाव पर तौलकर काट दी जाती है। यह सारा का सारा व्यापार विदेशी मुद्रा के नाम पर होता है। सवाल यही है कि ऐसी मुद्रा का क्या करना है, जिससे अपने ही देश की जनता का जीना मुहाल हो जाए। यह मांस निर्यात बढ़ रही महंगाई का एक बड़ा कारण बन गया है। अकेले पश्‍िमी उत्तर प्रदेश में रोजाना बीसियों हजार दुधारू मवोशियों के काटे जाने के कारण आज दूध 30 रु किलो पर पहुंच गया है। सच तो यही है कि यदि यह भैंसे दूध देती रहती तो आज भी दूध आम जनता के भोजन का हिस्सा बना रह पाता। यही नहीं मांस का अधिकतम मात्रा में निर्यात कर दिया जाना भी महंगाई का कारण बन जाता है। इस निर्यात के चलते मांस की अपने ही देश में उपलब्धता कम हो जाती है। जो मांस की मूल्य वृद्धि और इसके समान्तर में अन्य खाद्य वस्तुओं की महंगाई का कारण बन जाता है। यह मामला महज मांस के निर्यात उसकी अनुपलब्धता या इस कारण उसकी मूल्य वृद्धि हो जाने जितना सरल नहीं है बल्कि इसके पीछे अंतराष्ट्रीय षड़यंत्र भी है। जैसे ही भैसें इन कसाईगाहों के आना कम होंगी, गायें तथा अन्य दुधारू मवेशी भी काटे जायेंगें। काटे जायेंगे ही नहीं बल्कि देश के कई हिस्सों में आज भी हजारों की संख्या में रोज गायंे काटी जा रही हैं। अकेले आंध्र प्रदेश के अल कबीर में बूचड़ खानों में रोज की 10000 से ज्यादा गायंे काट दी जाती हैं। यह एक विदित तथ्य है कि गाय भारतीय जीवन पद्धति का एक आवश्‍यक अंग रही है। इसके गोबर, मूत्र, दूध, घी आदि सबका प्रयोग भारतीय समाज अनेक प्रकार से करता रहा है। गायें मवेशी नहीं, मां कहीं जाती रही हैं। गाय एक किसान के लिए स्वयं में एक आर्थिक अभिव्यक्ति हुआ करती थी। इसके बछड़े बड़े होकर हल चलाने वाले बैल बना करते थे। किसान आर्थिक रूप से न्यूनतम लागत पर खेत तैयार कर लेता था। अनाज पैदा होने में कम लागत लगती थी। उत्पाद की उपलब्धता रहती थी। मांस के बदले आधिक भुगतान करने की अंतराष्ट्रीय चाल के चलते पैसे के मोह में ‘मां’ बेची जाने लगी। ...और अमेरिका ने यहां अपनी जर्सी गायें निर्यात कर दीं। किसान की आर्थिक स्वतंत्रता छिन गई। यही खेल भारत के हर हिस्से में चल रहा है। समय रहते इस अमेरिकी षड़यंत्र को समझना होगा। सरकार को मांस निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर इन दुधारू पशुओं की सुरक्षा का बन्दोबस्त करना होगा।

-इस्लामुद्दीन


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