पानी की समस्या से जुझते लोग

गर्मी के दस्तक के साथ ही मध्यप्रदेश सरकार ने 36 तहसीलो को सुखा प्रभावित घोषित कर दिया। केवल 8 जिले सामान्य श्रेणी में है, जिससे भोपाल और उज्जैन जिलों के मुख्यलयों पर भी तीन दिन में एक ही जलापूर्ति हो रही है। बुंदेलखंड के सभी जिले जल संकटग्रस्त घोषित कर दिए गए है। उज्जैन का प्यास बुझाने वाला गंभीर बांध मार्च में ही सुख गया था। देवांस में लोग बूंद-बूंद के लिए तरस रहे थे, सो पानी के लिए तरस्ते इंदौर से ही देवांस पानी भेजा जा रहा है। सरकारी आंकडे बातते है कि प्रदेश की सात हजार से अधिक नलकूपे सुख चूके है। इसके अलावा करीब तीस हजार हैडपंप और 1300 से अधिक नलजल योजनाएं बंद पड़ी है। कई जिलों से लोग पलायन कर रहे है। गांवो के अधिकांश लोग रोज 12 से 14 घंटे केवल पानी जुटाने में ही खर्च कर देते है। टैंकर से पानी पहुंचाने के नाम पर तीन सौ करोड़ रूपये की चपत सरकार को लग रही है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जल संकट प्रतिदिन कितना गहराता जा रहा है। दिनोदिन भू-जल स्तर के कम होने से हैंडपंपो से पानी निकलना बंद हो गया है। गौरतलब है कि राज्य में ऐसे लगभग 164 शहर कस्बे है, जहाँ रोज पानी की आपूर्ति लंबे समय से नहीं हो पा रही है। वही ग्रमीण क्षेत्रों में 40000 हैडंपंप दम तोड़ चूके है। पानी को लेकर भोपाल और इंदौर में हत्याओं की घटना भी आम बात बन गई है। इससे भी ज्यादा खराब स्थिति राजस्थान की है। जहाँ पर लोग पानी के लिए एक दुसरे की हत्या करने में भी पीछे नहीं रहते, यहाँ पर सभी वर्गों के नलकूप और तालाब बढ़े हुए है, और कोई व्यक्ति किसी के नल कूप से पानी ले ले तो उस पर पंचायात द्वारा भारी जुर्माना लगाया जाता है। यहाँ के लोग कर्ज तो लेते है पर पैसे का नहीं पानी का कर्ज। लोग अपने-अपने नल कूपो पर ताला लगा कर रखते है। और उसकी रखवाली करते है। यहाँ पानी मंहगा और जान सस्ती है। हालांकि राज्य सरकार जल से निपटने के लिए योजना तो बना रही है पर ये योजनाए कारगर साबित नहीं हो रही है। मालवांचल और उज्जैन की पेयजल संकट के स्थायी समाधान के लिए नर्मदा-क्षिप्रा बांध को जोड़ने के कारगर उपाए किए जा रहे है। लोगो से पानी बचाने की अपील भी की जा रही है। दुनिया में पानी की मात्रा सीमित है। हालांकि हमेशा हमे सुनने को मिलता रहा है कि पानी आसीमित है। संसार में पानी की बहुतायत है और इसलिए मानव जाति ने पानी का हमेशा दुरुपयोग ही किया है। लेकिन 20वीं शताब्दी के अन्त में यह बात सामने आई की पीने योग्य मीठा बहुत ही सीमित है और इसी सीमित पानी से संसार में रहने वाली सभी प्रजातियों को गुजारा करना होगा। वैज्ञानिकों के अनुसार अगले दो दशको में पानी की कमी के कारण हमें जो कुछ भुगतना पड़ सकता है, उसकी फिलहाल कल्पना भी नहीं की जा सकती। अभी संसार में मानव जितना पानी इस्तेमाल कर रहा है अगले दो दशको में यह और अधिक बढ़ेगा। यह इस्तेमाल वर्तमान के मुकाबले 40 प्रतिशत अधिक तक जा सकता है। जबकि ‘‘ग्लोबल एनवायरमेंट आउटलुक’’ की रिपोर्ट के अनुसार 2032 तक संसार की आधी से अधिक आबादी भीषण जल संकट की चपेट में आ जाएगी। पृथ्वी का केवल 2.7 प्रतिशत जल ही पीने के योग्य है। ऐसे में इतनी लापरवाही से इसके उपयोग ने संकट को और भी गहरा दिया है अगर इसके पीछे के कारणों पर नज़र डाले तो न बढ़ती जनसंख्या, बल्कि उघोग धंधों के बढ़ते जाल ने भी इस समस्या को विकट बनाया है। गंगा को जिस रफ्तार से प्रदूषित किया जा रहा है उसके दुस्परिणामों को देखकर ही राजीव गाँधी के शासनकाल में ‘गंगा एक्शन प्लान’ लाया गया था। वह योजना काफी जोर-शोर से शुरु हुई थी, लेकिन परिस्थतियां आज भी जस की तस बनी हुई है। पानी को लेकर इतिहासकार मार्क ट्वेन ने कहा था- पूरा विश्व व्हिस्की पिएगा और पानी के लिए युद्ध लड़े जाएगे, उनका यह कथन इतने वर्षों के बाद भी उतना ही प्रासांगिक है। विशेषज्ञो का मानना है कि अब किसी और मुद्दे पर नहीं, बल्कि पानी के लिए तीसरा विश्वयुद्ध लड़ा जाएगा। ऐसा अनुमान अभी भले ही हमें हास्यापद लगता हो, लेकिन परिस्थितियाँ जिस कदर बिगड़ रही है, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि वह दिन भी अब दूर नहीं।

-Shahnaz Ansari



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