बाकी देश को राम ही बचाये....


भारतदेश सदियों तक गुलाम रहा। इतनी सदी बीत जाने के बाद उसे कड़ेसंघर्षों के बाद आजादी मिली। आजादी मिली तो 60 साल पूरे होते-होते अपने निकम्मेपन को भी दर्शा दिया। चाहे राजनैतिक पृष्टभूमि की बात होया फिर किसी प्रशासनिक व न्यायिक ढांचे की नीतिगत बातें। हर स्तर परऔंधे मुंह और चित्त खा कर गिरी हुई है संवेदनशीलता। देश की आजादी के साथ-साथ हमें जो चीज विरासत में मिली उसकी तरफ बहुत कम लोगों का ध्यान गया होगा। यह मेरा मानना है। आजादी की वर्षगांठ और अपने विकास की जितनी भी वाह-वाही लूटे परन्तु छुपे रुस्तम की तरह आजादी के साथ भ्रष्टाचार और कालाबाजारी का जो वाइरस भारत की जनता को मिला उसके बारे में ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह काला अजगर आज आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों पर बादशाहत कायम किए बैठा है। देश के विभिन्न क्षेत्रों से क्षेत्रवाद की आग, प्रशासनिक रवैये के खिलाफ उठा नक्सलवाद का विषैला फन और राजनीति की गद्दी पर बैठा दुराचार और कुख्यात जगत का सफेदपोश असुर। यह सबसे बड़े प्रमाणिक हुक्मरान हैं, जिनके द्वारा आने वाला कल फिर महासंग्राम का घंटा बजाने के लिए आतुर बैठा है पहले-पहल तो भारत किसी दशा में अपने को संभालने लायक है नहीं, क्योंकि संसद का हमला, लालकिले की साजिश और मुम्बई का विध्वंसकारी घटना, आज भी रोंगेटे खडे़ करने के लिए काफी हैं। फिर आर्थिक जगत की महामारी में देश की सुरक्षा हेतु तोप-बन्दूकों से लेकर शेयर बाजार की गतिविधि और फिर खेल जगत पर लगते कलंक, क्या इन्हें देश के लिए असुरता की देन नहीं माना जाना चाहिए? देश की आजादी पाने के लिए जितने स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना बलिदान दिया होगा, उससे ज्यादा इन 60 सालों में देश की आजादी के बाद स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिकों ने आंतकियों की गोलियों से अपने को बलिवेदी चढ़ा दिया है। यदि ये सबकुछ आजादी के बाद भी सहना था तो फिर आजादी का मायना क्या रहता है? जो हुआ सो हुआ। आज राजनैतिक डंडा अपने हित और खोखली सोच के कारण जाना जाता है। आम व्यक्ति अपने मूलभूत अधिकारों के लिए तरस रहा है। सफेद कागज और सरकारी तंत्र से जुड़े लोग ही अधिकारों के संविधान का मजाक उड़ाने में लगे हैं। सरकारी खातों का बेजा इस्तेमाल अपने निजी हितों के लिए हो रहा है। समाजसेवा के नाम पर करोड़ो रुपये विभिन्न माध्यमों से हर वर्ष उड़ाये जाते हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के साथ रोटी-कपड़ा और मकान पर भारतमाता का खूब चीरहरण आज के दुशासन कर रहे हैं। अफसोस इस बात का है कि इस अंधेर नगरी में ना तो धृष्टराष्ट्र है, न ही भीष्म पितामह। कहीं पाण्डव भी नहीं दिखाई देते हैं। अगर कोई विरला पांडव किसी कोने में है तो वह बिमारी की हालत में पड़ा हुआ है और सिर्फ दिख रही है तो विवश भारतमाता। मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि विश्वास के नाम पर कुछ भी शेष नहीं है। समाचारों के माध्यम से उठने वाले मसले भी उतने ही काले है जितना उन्हें होना चाहिए। न्याय की उम्मीद पर स्याह का धब्बा चढ़ा है जिसे देखना नामुमकिन है। आयकर हो या फिर आईपीएल सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे दिखते हैं। इन अर्थहीन मुद्दों से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। बाकी तो देश को राम ही बचाये।

- जे. पी. बिष्ट

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