कोसी-पुत्र अब अपनी उपेक्षा बर्दाश्‍त नहीं करेगा: नरेश बादल


‘‘दूसरों को मारकर जीना ‘विकृति’, अपने लिए जीना ‘प्रकृति’ और दूसरों के लिए जीना संस्कृति है’’ की समझ हमारी चेतना और चिंतन का हिस्सा है और यह जीवन का प्रस्थान बिन्दू भी...। जीवन की इस संस्कृति को हमने ‘संघर्ष’ और ‘सृजन’ का उपादान दिया। अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आत्म-उत्सर्ग ही हमारी आत्म अभिव्यक्ति और जीवन का उद्देश्‍य है। ये बातें चैथम प्रखंड के प्रधान नरेश प्रसाद बादल ने एक बातचीत के दौरान कहीं। श्री बादल ने कहा कि चैथम प्रखंड (खगड़िया, बिहार) भू- स्वामियों का गढ़ रहा है। एक समय में सामाजिक और आर्थिक विश्‍मता चरम पर थी। अतीत में छिट-पुट संघर्ष भी हुए, पर लड़ाई निर्णायक नहीं रही। सामंती अत्याचार का जीता-जागता उदाहरण बन चुका यह प्रखण्ड दलित, वंचित, पिछड़ों की गुलाम स्थिति का गवाह रहा। इस गुलामी के खिलाफ हमने लड़ाई लड़ी। हमने शब्दातीत संकट, संघर्ष और सजा भोगी। आज वह गुलाम समाज स्वाभिमान के साथ खड़ा है। उन्होंने आगे बताया कि सामंतवाद और भू-स्वामियों के शोषण के साथ-साथ दबंग जातियों की गुंडई भी कम खतरनाक नहीं थी। कमजोर और बेजुबां किसानों की जमीन पर दावेदारी उन गुंडों की थी। सैकड़ों एकड़ जमीन उन जातीय गुंडों के कब्जे में थी। सतत् संघर्ष का सिलसिला शुरू हुआ। वर्षों बाद किसानों ने अपनी खोई जमीन पाई। इस संघर्ष में हमने हर संभव भूमिका निभायी। श्री बादल पिछले बीस वर्षों से लगातार अपने पंचायत में मुखिया के रूप में चुने जाते रहे हैं। वर्तमान में प्रखंड- प्रमुख होना उन्हीं संघर्षों की दृश्‍यमान उपलब्धि है। विकास की सम्भावना के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि सोना उगलने वाली मिट्टी, पशुओं के लिए पर्याप्त चारागाह और दर्जनों नदियां और उसमें पर्याप्त जल के बावजूद कोसी क्षेत्र का हाल बेहाल है। प्रकृति का प्रकोप जितना बड़ा कारण नहीं उससे बड़ा कारण राज्य और केन्द्र की सरकार की उपेक्षा है। भारतीय लोकतंत्र में कोसी पुत्र केवल एक वोटर लिस्ट भर है। कोसी का काम केवल संसद और विधान सभा के लिए प्रतिनिधि चुनना भर है। आज तक किसी भी पार्टी और नेताओं ने कोसी क्षेत्र की सुध नहीं ली। कोसी क्षेत्र आज भी अपनी बुनियादी सुविधा की बहाली के लिए तरस रहा है। स्थानीय संसाधन के आधार पर बड़े-बड़े उद्योग यहां खुल सकते हैं, पर आज तक नहीं खुले। जो छोटे-बड़े उद्योग थे भी, वे बंद पड़े हैं। मछली पालन, पशुपालन, मखाना, मकई और जूट उद्योग को बढ़ावा देने की हर घोषणा एक छलावा साबित हुई है। बेकारी, बीमारी और बदहाली का शिकार यह क्षेत्र वीरान हो रहा है। गांवों से युवाओं का पलायन जारी है। नौकरी की संभावना नहीं और कर्ज में आंकठ डूबी खेती से मजबूर लोग भाग रहे हैं। उन्होंने सुशासन के दावों पर कहा कि ‘बदल रहा बिहार’ का कथित प्रचार कोसी क्षेत्र का मुंह चिढ़ा रहा है। एक भी बड़ा शिक्षण संस्थान नहीं खुला। तकनीकी और उच्च षिक्षा के नाम पर हजारों करोड़ रुपया बिहार का दूसरे प्रान्त में जा रहा है। छोटी बीमारी का भी इलाज हम दूसरे प्रान्त में कराने जा रहे हैं। खगड़िया, एशिया का सबसे बड़ा मक्का उत्पादन केन्द्र है। आखिर खगड़िया में मक्का आधारित उद्योग क्यों नहीं लग पाया। मकई का समर्थन मूल्य सरकार क्यों नहीं देना चाहती। सरकारी खरीद का कोई केन्द्र नहीं खुल पाया, क्यों? सरकार से ही नहीं जनता सभी दलों से सवाल कर रही है कि क्यों नहीं इन नकारे दलों का बहिष्‍कार किया जाये? उन्होंने कहा कि विकास के बनते हुए टापू से खदेड़ी गई जमात और पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति के हक और हकूक की लड़ाई में हम सदा साथ रहे। समाज के शोषित वर्ग, चाहे वह किसी भी जाति के क्यों न हों, की हर संभव सहायता करने को ही अपना धर्म समझा। और अब इस प्रखंड की मूलभूत समस्याओं को दूर करने के लिए जनता के सामने विकल्प रखने की भी हमारी तैयारी है। जल्द ही यह तैयारी धरातल पर दिखाई देगी।


-अमित तिवारी

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