मजदूरों के लिए कितना सार्थक है मजदूर दिवस

1886 में मजदूरो ने पहली बार शिकागो शहर में रैली निकाली थी, तो उनकी एक ही मांग थी कि ‘‘हमारे काम के घंटे आठ घंटे होने चाहिए’’ पुलिस ने उनके ऊपर गोलीयां चलाई जिसमें कई मजदूर शहीद हुए। अततः उनकी बात मानी गई। काम के घंटे आठ किए गए। उसी की याद में हम ‘मई दिवस’ या ‘मजदूर दिवस’ मनाते है। लेकिन हम महसूस करते है कि मजदूर अन्दोलन के सामने जो समस्याएं उस वक्त थी, इतने सालों के बाद भी जस की तस है। एक अनुमान के मुताबिक 36 करोड़ मजदूर है, जिनके जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं है। इन 36 करोड़ मजदूरो में से 95 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में है। असंगठित क्षेत्र में मजदूरो के लिए न तो कार्य के घंटे निधार्रित है, न ही कोई वेतन आयोग है, उनके लिए न ही काम की निश्चितता है, न ही कोई नियम कानून है। न ही सामाजिक सुरक्षा न काम करने के लिए सुरक्षित माहौल है। सबसे बड़ी बात यह है कि श्रमिको का अभी तक न्यूनतम वेतन ही निधार्रित नहीं किया गया है। इनके हित के लिए बने किसी भी सरकारी कानून को ठीक से लागू नहीं किया जाता है। मजदूर के खिलाफ समूचे देश में शोषण का साम्रज्य कायम है। आज़ादी के साठ सालों के बाद भी उनकी दशा में कोई सुधार नहीं हो पाया है। उनके लिए आज़ादी मिलने और लोकतंत्र का राज कायम होने का कोई मतलब नहीं है, वे आज भी उतने ही शोषित है, जितना गुलामी के दौरान थे। आज कल मजदूर संगठनों का प्रभाव भी घटता जा रहा है, जिसका सबसे बड़ा कारण इन संगठनों का विभाजन है। जो भी राजनीतिक पार्टी का जन्म होता है वह अपने प्रभाव के कारण एक टैªड युनियन को भी जन्म देता है। इसके चलते मजदूर आन्दोलन का राजनीतिक पर बंटवारा हो चुका है। अब इसे जाति के आधार पर बांटा जा रहा है, धर्म के आधार पर बांटा जा रहा है और तो और मजदूरो को शिल्प और श्रेणी के आधार पर भी बांटा जा रहा है। एक तरफ जहा दुनिया के दुसरे देशों में मजदूर संगठन आपस में मिल रहे है, वही हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहां मजदूर संगठनोें को विभाजन किया जा रहा है। आज श्रमिको की सप्लाई माल की तरह की जा रही है। राज्य सरकार के कानूनों को ठेंगा दिखाकर अथवा अधिकारियो से मिलिभगत कर अनेक मजदूरो का शोषण करते है। सरकारी नियमों की धज्जिया उडाते हुए ये तमाम ठेकेदार अधिकारियो की मिलीभगत से मजदूरो का शोषण करते है। इनके वेतन और भते में कटोती करते है। यहा तक की श्रमिको से 12 घंटे की हाड़-तोड़ मेहनत के बावजूद उनको साप्ताहिक अवकाश भी नहीं दिया जाता, उन्हें मूल-भूत सुविधाएं तक नहीं देते जिसमें काम की उचित जगह साफ वातावरण, नियमित चाय-पानी, शौचालय की व्यवस्था आदि शामिल है। अतः राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ अंसगठित क्षेत्र के श्रमिको को संगठित करने के जरुरत है। सूचना का अधिकार तथा उपभोक्ता कानून की तर्ज पर श्रम निरीक्षको पर नजर रखने के लिए संगठन की व्यवस्था होनी चाहिए जिससे ये तय हो सके कि श्रम निरीक्षक अपना कार्य ईमानदारी से कर रहे है या नहीं। एक मई ‘विश्व मजदूर दिवस’ एक आॅपचारिकता न बने और कुछ ठोस निषकर्ष निकले। इसके जरुरी है कि हम श्रम कानूनो का कड़ाई से पालन करे। तभी समाज के इस निम्न वर्ग का भला हो सकता है। जो वास्तविक आधार है इस समाज का, इस देश का, जब तक देश और समाज के इस वर्ग का भला नहीं होगा तब तक कोई भी ताकत इस देश और समाज का भला नहीं कर सकती। कुछ जगहांे पर श्रमिको को जागरुक करने का काम होना चाहिए, वास्तव में मजदूर दिवस मजदूरो को शोषण से मुक्ति दिलवाने का आहाण है। तभी हम मजदूर दिवस को सार्थक बना सकते है।


-Shahnaz Ansari

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1 comments:

कविता रावत said...

मजदूर दिवस पर बहुत बढ़िया सार्थक सामयिक प्रस्तुति ...

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