जाति-आधारित जनगणना के समर्थन और विरोध का बिगुल

देश में जाति आधारित जनगणना का काम शुरू हो गया है। न चाहते हुए भी मनमोहन सरकार ने जाति आधारित जनगणना के लिए हामी भरी। देशहित को दांव पर लगाकर सभी जमाती नेतृत्व अपनी-अपनी जमात के हित के लिए पक्ष-विपक्ष में खड़े हो गये। शरद यादव (जद-यू), लालू यादव (राजद), गोपीनाथ मुडे (भा- जपा), मुलायम सिंह यादव (सपा), वीरप्पा मोइली (कांग्रेस), मायावती (बसपा) आदि ने जाति आधारित जनगणना के लिए सरकार पर दबाव डाला। गृहमंत्री चिदम्बरम के विरोध के बावजूद प्रणव मुखर्जी ने प्रधान मंत्री की मौजूदगी में घोषणा की कि जनगणना का आधार जाति ही होगी। बस यथास्थितिवाद के पोषक प्रणेताओं, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि देश में अनर्थ हो जायेगा, देश टूट जायेगा, जातिवाद फिर पनप उठेगा... पिछड़ा, दलित नाजायज सूचना देकर नाजायज फायदा उठायेंगे आदि आदि। जनगणना के फार्म पर लोगों से जाति नहीं लिखने की अपील कर रहे हैं और कह रहे हैं कि जाति के बदले ‘हिन्दुस्तानी’ लिखा जाये। सूचना तकनीक के उफान के इस काल में ‘जात-पात’ की बात करना घिनौना कृत्य है। इससे दुनिया में भारत की छवि खराब होगी। सस्ती लोकप्रियता हासिल करने तथा जात-पात को बनाये रखने वाले ये कथित देश-प्रेमी कौन है? इसके वर्गीय चेहरे को बेनकाब करना जरूरी है। ये भाईचारा चाहते हैं, पर दलित-पिछड़ा केवल ‘चारा’ और ये ‘भाई’ कब तक बने रहेंगे? मुझे उम्मीद थी कि बदलते वक्त के साथ ब्राह्मणवादी ताकत भी अपने भीतर बदलाव लाये होंगे। पर परिणाम निराशा जनक है। ब्राह्मणवाद विवश है, वरना आज भी ये कपार पर चढ़कर मूतने को तैयार हैं। ये मजबूर हैं, पर मिजाज वही पुराना है। इन्होंने अपनी केवल चाल बदली है, चिंतन और चरित्र वही पुराना तुलसीयुगीन वाला है। दलित-पिछड़ों के असीम धैर्य की परीक्षा कब तक ली जाती रहेगी। सदियों की पीड़ा भोगी, जुल्म सहा। इनकी सहनशक्ति इतनी है कि ये उलटकर बदला नहीं ले रहे हैं, यही गनीमत है। देश के 80-85 फीसदी आबादी पर 15 प्रतिशत का शासन...? सदियों से इनके श्रम और संसाधन का भोग? श्रमहीन-कर्महीन ब्राह्मण- संस्कृति का इतिहास क्या छुपा हुआ है? ये दलित पिछड़ा अपना अधिकार लेना चाह रहे हैं किसी के अधिकार का हनन नहीं कर रहे हैं। ब्राह्मण, संस्कृति ने हजारों वर्षों से इनके अधिकार का जो दुरुपयोग किया, उसका हिसाब आखिर कैसे हो? जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी...? अभी तो आरक्षण 50 प्रतिशत ही है, इसे जबकि और बढ़ाने की जरूरत है। इससे काम चलने वाला नहीं है। यह भी 50 प्रतिशत का जो आरक्षण है, वह कहां और कितना मिला, सरकार से ये जातिवादी क्यों नहीं हिसाब लेते। सत्य तो यही है कि अभी तक बैकलाॅग पड़ा है। सीटें खाली पड़ी है। आरक्षण का फायदा है कहां? आज जो भी फायदा दिख रहा है पिछड़ों ने अपनी मेधा, मेहनत और प्रतिभा के बल पर हासिल किया है, न कि आरक्षण के बल पर। आरक्षण को लेकर भी जो हाय तौबा मचा रहे हैं कि देश के मेरिट का नाश हो जायेगा, अयोग्य व्यक्ति को आरक्षण का लाभ मिलेगा तो देश को बेहतर परिणाम कहां से मिलेगा? सत्य है कि जितने इंजीनियर के पूल टूटे हैं, जिन डाक्टरों ने पेट में कैंची छोड़ा, जिसने शिक्षा को बेचा, ये कोई आरक्षण वाले डाक्टर-इंजीनियर नहीं है। उच्च शिक्षण संस्थान से शिक्षा पाकर विदेश भागने वाले सबसे ज्यादा किस जात के हैं? एम.बी.ए और आई. आई. टी. पर खर्च होने वाला लाखों करोड़ों रुपया देश का है। पर इन्हें देश की चिंता नहीं। इन्हें अमेरिका प्यारा है। कहना नहीं पड़ेगा कि अमेरिका में रह रहे 90 प्रतिशत प्रवासी सवर्ण है। कौन कितना देशभक्त और देश द्रोही है, यह सबके सामने है। जाति आधारित जनगणना देश के हित में है और देश की एकता के लिए जरूरी जरूरत है। इसके बिना देश एक कैसे रह सकता है। समान अवसर दिये बिना समानता कैसे आयेगी और समानता के बिना एकता कैसे होगी? समान अवसर देने की घोषणा की असलियत क्या है, इसका खुलासा तो जाति आधारित जनगणना से ही संभव है। बाजारवाद और ब्राह्मणवाद में क्या चरित्रगत अन्तर है। दोनों ही विशमता, शोषण, लोभ और आलस के बल पर आगे बढ़ते हैं। ज्ञान-सत्ता पर दावेदारी आज भी बहाल है। मीडिया मनुवाद का आधुनिक संस्करण है। नीचे से ऊपर तक ये लोग ही कुंडली मारकार क्यों बैठे हैं? केवल इसीलिए कि जातीय हित को कैसे साधा जाय। सत्य है कि जातीयता गंदी है और इसे फैलाने वाले और ही गंदे लोग? जाति खत्म हो पर कैसे? रोटी-बेटी का संबंध बने बिना हम जन गणना फार्म पर ‘हिन्दुस्तानी कैसे लिखेंगे भाई? रोटी-बेटी का संबंध बहाल हो जाय तो आरक्षण को यूं भी खत्म कर देना होगा। रोज ‘मेटरीमोनियल’ में जाति का लड़का खोजा जा रहा है। हर पार्टी चुनाव में जातीय समीकरण बनाती है। जात देखकर पदाधिकारी बनाये जाते हों, तो फिर कैसे कह रहे हैं कि जात-पात खत्म हो गया। देश में जात-पात को खत्म करने में अब भी पिछड़ों की ही भूमिका अहम है। बजबजाती जिन्दगी ये भी नहीं जीना चाहते। पिछड़ों में जातिवाद खत्म करने की क्षमता की बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि ये अब भी प्रतिक्रियावादी नहीं बनें हैं। एक्षन की उम्मीद इसी वर्ग से की जा सकती है। इतिहास गवाह है कि हजारों वर्षों तक यह देश गुलाम क्यों रहा? क्यों मुट्ठी भर आक्रान्ता देश को लूटते रहे? हमारी प्रतिरोधी शक्ति कहां मर गई थी। उत्तर साफ है कि हमारा देश अगड़ो-पिछड़ों में बंटा था, छूत-अछूत से संतप्त था। क्या अब भी हम वही सोच रखते हैं कि भारत का मन आज भी उसी तरह विभाजित रहे और विदेशी हमें लूटता रहे। देश का मतलब केवल भूखंड नहीं है बल्कि वहां रहने वाला जन- गण-मन है। पूरे समाज को मजबूत बनाना ही देशभक्ति है। देशभक्ति का मतलब ही क्या होता है? वक्त है कि काल बाहय, सड़े और मरे हुए विचारों के खोल से अपने को बाहर निकालें। जाति के खिलाफ लड़ाई केवल डाॅयलाॅग से नहीं एक्षन से संभव है। जाति आधारित जनगणना का विरोध एक राष्ट्र-विरोधी कृत्य है, इससे बचना चाहिए।

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