कंपनी राज और भारत (अ) सरकार

विदेशी पूंजी और तकनीक के बूते खुला बाजार सुरसामुख की तरह फैल रहा है। यह हमारी स्वदेशी शक्तियों, ज्ञान परंपरा, स्वावलंबन और अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता को निगलता जा रहा है। ‘भारतीय जैव टैक्नाॅलजी प्राधिकरण विधेयक’ के जरिये सरकार एक ऐसा कानून लाने जा रही है, जिसके बाद सामाजिक संगठन, मीडिया और आमजन जैव रूपांतरित बीजों से फसलों व सब्जियों को उगाने की आयातित तकनीकों का विरोध नहीं कर सकेंगे। फिर चाहे ये तकनीकें मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से हानि कारक हों अथवा हमारी कृषि और किसान को उजाड़ने वाली हों। इस कानून को वजूद में लाने की प्रक्रिया शुरू होने की प्रतिछाया में लगता है कि भारत सरकार विदेशी कंपनियों के साथ ही नहीं खड़ी बल्कि उनके व्यापारिक हितों के दृष्टिगत कानूनों को सरल व सख्त बनाने के उपाय भी कर रही है। बी.टी. बैंगन की देशव्यापी खिलाफत के बाद इसके प्रयोग व उपयोग को केन्द्र सरकार को फिलहाल टालना पड़ा है, उसी परिप्रेक्ष्य में कंम्पनियों के दबाव के समक्ष केंद्र सरकार घुटने टेकती नजर आ रही है। इसी तारतम्य में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अन्तर्गत जैव टेक्नोलाॅजी नियमन प्राधिकरण’ बनाने जा रही है। इस विधेयक को कानूनी मान्यता मिलने के बाद संकर बीजांे के इस्तेमाल के संबंध में पर्यावरण व कृषि मंत्रालय की भूमिका तो खत्म होगी ही साथ ही देशवासियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी ताला जड़ दिया जाएगा। संविधान के अनुच्छेद 19.1 ‘ए’ के अनुसार देश के नागरिकों को सरकार की गलत नीतियों का खुला विरोध व आलोचना करने का अधिकार मिला हुआ है। इस संवैधानिक शक्ति के बूते ही लोकहित के पक्षधर तमाम संगठनों ने बीटी बैंगन का राष्ट्रव्यापी विरोध किया था। लेकिन अब हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित साधने वाले मंसूबों का विरोध नहीं कर पाएगें। आमजन की जबान पर लगाम लगाने वाले इस कानून में व्यवस्था है कि जो व्यक्ति बिना प्रमाण एवं वैज्ञानिक रिकाॅर्ड के जनता को जीएम फसलों के प्रयोग व उपयोग को खतरनाक बताएगा उसे कम से कम छह माह और ज्यादा से ज्यादा एक वर्श की सजा या दो लाख का अर्थ-दण्ड अथवा दोनों सजाएं एक साथ दी जा सकती हैं। तय है कि खेत, खेती और खुदरा व्यापार पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जबरिया कब्जा होने की तैयारी कर ली गई है। नतीजतन कुछ ही सालों में देश का समूचा खाद्यान्न, उसके सहायक उत्पाद और खेत व खेती से जुड़े खुदरा व्यापार व रोजगार चुनिंदा कंपनियों की ंिगरफ्त में आ जाऐंगे। जबकि देश की सत्तर प्रतिषत से भी ज्यादा अकुशल व अशिक्षित आबादी की आजीविका के यही प्रमुख साधन व श्रोत हैं। कंपनियों के मंसूबे जाहिर करते हैं कि खेत और खेती से जुड़ा जो व्यापार है, उस पर कंपनियों का एकाधिकार हो जाए। इसलिए कंपनियों का रुझान न केवल खेती पर है, बल्कि खाद्यान्न की आपूर्ति श्रंृखला और वितरण व्यवस्था पर भी पूरी तरह नियंत्रण करना है। भारत में करीब 150 अरब डाॅलर का खुदरा व्यापार है। यह सालाना 45 से 50 प्रतिशत की दर से बढ़ भी रहा है। नील्सन द्वारा देश के आठ शहरों में किए गए एक सर्वे के मुताबिक नवंबर 2006 से 2007 के बीच भारत में ब्रांडेड भण्डारों के मार्फत सामान की बिक्री में सीधे तौर पर 90 प्रतिशत का उछाल आया है। इन सालों में जो खुदरा व्यापार 322 अरब डाॅलर का था, वह 2011-12 में 590 अरब डाॅलर तक पहुंच जायेगा। खुदरा व्यापार की खरीद-बिक्री का बड़ा हिस्सा सीधे खेती-किसानों, मजदूर तबके से जुड़ा है। इसलिए देशी-विदेशी कंपनियों के मालिक खेत की पैदावार से लेकर इसकी वितरण प्रणाली पर भी कब्जे की होड़ में हैं। इस कारण बड़े उद्योगपति इस छोटे दिखने वाले धंधें में पैर पसार रहे हैं। वालमार्ट, माॅन्सेंटों, माहिको जैसी विदेशी कंपनियों की निगाह तो इस करोबार पर है ही, अब देशी कारोबारी अंबानी, भारती, टाटा, महिंद्रा और गोदरेज भी बड़ी पूंजी के साथ इस धंधे में उतर रहे हैं। अनेक देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां आपस में भागीदारी करके भी इस मैदान में बाजी मारने की होड़ में हैं। भारती एंटर प्राइजेज ने ब्रिटिश कंपनी एलरो के साथ समझौता कर ‘फील्ड फ्रेश’ नाम से फल-सब्जियों के कारोबार में खुद को उतार लिया है। टाटा की कंपनी एग्रो प्रोड्यूज बड़े पैमाने पर जैविका ईंधन और सब्जी व फल उत्पादन के क्षेत्र में उतरने की तैयारी में है। कंपनी ने अपनी बिक्री का शुरूआती लक्ष्य एक अरब डाॅलर रखा है। रिलायंस रिटेल लिमिटेड भी 250 करोड़ रुपये के निवेश के साथ इस कारोबार में पहले ही आ गया है। वह हिमाचल के हार्टि कल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग एण्ड प्रोसेसिंग कारपोरेशन से तीन हजार एकड़ क्षेत्र में फैले बागान ठेके पर ले चुका है। भारती-वालमार्ट ने सेबों के रख-रखाव व वितरण के लिए रिलायंस से हाथ मिलाया हुआ है। रिलायंस रिटेल लिमिटेड ने 784 शहरों में 6000 थोक व्यापार के बाजार और 16000 ग्रामीण वाणिज्य केन्द्र बनाने की योजना तैयार की है। महिंद्रा भी ‘शुभ-लाभ’ कम्पनी के नाम से एक लाख एकड़ जमीन पर खेती करने जा रहा है। गोदरेज ‘आधार’ नाम से एक कंपनी खड़ी कर उन्नत खेती और फसल के उचित दाम दिलाने की सलाहकार की भूमिका में आ गया है। ये पूंजीपति खेत से सीधे दुकान तक की दौड़ में फसल व सब्जी की उम्दा किस्में और कम मूल्य के नारे व दावे के साथ है। लेकिन यह स्थिति तब तक है, जब तक देश के समूचे खाद्यान्न और उसकी वितरण व्यवस्था पर उनका एकाधिकार नहीं हो जाता? सरकार नियम कानूनों में जिस तरह से ढील दे रही है, उससे तो लगता है जल्द ही ये कंपनियां अपने मकसद में सफल हो जायेंगी।
भारत सरकार निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के दृष्टिगत थोक, भण्डारगृह, शीतगृह, खाद्य प्रसंस्करण आनुवंशिक बीज के निर्माण, वितरण और निर्यात में बड़ी मात्रा में छूट व सब्सिडी दे रही है। अगले पांच सालों में केन्द्रीय प्रसंस्करण खाद्य मंत्रालय देश में करीब 30 मेगा फूड पार्क बनाने जा रहा है। भरपूर अनुदान के आधार पर इन्हें विकसित करने की जिम्मेदारी इन्हीं कंपनियों को सौंपी जा रही है। खेती और उसके सहायक उत्पादों के भण्डारण व वितरण से जुड़े इन धंधों के परिणाम विनाशकरी तो होंगे ही ये बेरोजगारी भी बढ़ायेंगे। हमारे देश में मशीनीकरण के बाद सीधे-सीधे 25 से 28 करोड़ ऐसे लोग बेरोजगार हुए थे जो लघु व कुटीर उद्योग और खेती से जुड़े रहकर रोजगार कर रहे थे। अब कंपनियों के दखल के बाद देश की खेती-किसानी से जुड़ी सत्तर फीसदी आबादी पर आजीविका और रोटी का संकट गहराने वाला है। इस आर्थिक विसंगति को दूर करने के लिए विकास की वर्तमान अमेरिकी-आर्थिकी में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की जरूरत है।

-प्रमोद भार्गव

साभार: सामयिक वार्ता

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