डरावने जंगल, मौत की आहटें और कितनी जायेगी जान?

भारत का जंगल खौफनाक है। खौफ ंिहंसक जानवर का नहीं, बल्कि नरभक्षी नक्सलियों का है। सिंह की गर्जना नहीं, बल्कि गनों की आवाज है। सांय.... सांय.... धांय.....धांय..... बस मातमी सन्नाटा और मौतों की आहटें। कौन है ये नरभक्षी? कैसे हो गये नरभक्षी? भर मुंह बोली नहीं, सामने बैठने की हिम्मत नहीं, पेट में रोटी नहीं, तन पर कपड़ा नहीं, बिल्कुल भोला-भाला! फिर क्यों उठायी बंदूकें...? क्या इन्हें कोई बहका रहा है? क्या कोई इन्हें सनका रहा है? दुनिया के इस विषाल लोकतंत्र में क्या इनके लिए कोई जगह नहीं है? आजादी की लड़ाई में तिरंगा इनके खून से भी तो सना था? क्या आदिवासी-समाज हिंसक हो गया है? क्या गौतम और गांधी को ये नहीं जानते? कई चीखते सवाल हमारे सामने हैं। ‘‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, वरना ये आदिवासी इतने बेवफा नहीं होते।’’ लगातार खूनी घटनाएं अंजाम ले रही हैं। लगातार देश के सैनिक मारे जा रहे हैं। कभी 75 तो कभी 8। एक दो के मरने और मारने की बातें तो आम हो गई हैं। लाल कोरीडोर का पैमाना रोज बदल रहा है। जंगल क्या, अब इसकी लपटें मैदान की ओर भी हैं। चारो ओर आंतक का धुंआं। आन्तरिक सुरक्षा के लिए नक्सली सबसे बड़ा खतरा.........! और इसके सफाये के लिए ‘ग्रीन हंट.....।’ सरकार का ‘ग्रीन-हंट’ ज्यों ही आगे बढ़ता है, त्यों ही निर्दोश नौजवानों की शहादत की खबरें सामने आ जाती है। फिर वही घिसे पिटे विरोध, कार्रवाई के स्वर और बहसें। नक्सलियों से बिहार पहले भी तबाह था, अब तबाही और बढ़ गई है। पिछले दिनों बिहार के कई रेलवे ट्रैक विस्फोट से उड़ा दिये गये। भाजपा नेता के घर को उड़ा देने की खबर सुर्खियों में है। इधर बांग्लादेश से माओवादी दस्ता भारत में प्रवेश कर गया है, जिसका परिणाम बहुत ही खतर नाक साबित होने वाला है। नक्सलियों के मुहाने पर दिल्ली है। सरकार को सब पता है। सरकार को पता है कि नक्सलियों का समर्थक वर्ग सिकुड़ा हुआ नहीं है। इसका दायरा लगातार बढ़ रहा है। नक्सल समर्थक बुद्धिजीवियों से भी सरकार निपटने के मूड में है। सरकारी पार्टी भी दो भागों में बंट गई। कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता दिग्विजय सिंह नक्सली समस्या को ‘लाॅ एण्ड आर्डर’ की समस्या नहीं मानते। इधर समाजवादी नेता रघुठाकुर ने कहा कि ‘नक्सली ये तो बतायें कि वे चाहते क्या हैं?’ सरकार वार्ता करे, तो किन से करे। कोई भी पार्टी हिंसा का समर्थन नहीं करती। कई ऐसे नक्सली नेता इतने संवेदनशील दिखाई देते हैं कि कल्पना ही नहीं की जा सकती कि ये हिंसा भी कर सकते हैं? माओवाद की शरण का क्या मतलब? आदिवासियों को माओवाद चाहिये या माओवादियों को आदिवासी की जरूरत है। आजादी के बाद जिस भारत के नवनिर्माण की तैयारी रहनुमाओं पर थी, यह सत्य है कि वे नकारा साबित हुए। जिस मात्रा में विकास होना चाहिये, वह यहां नही हुआ या फिर इस आरोप से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान सरकारें किसी भी पार्टी की हों, जनहित से ज्यादा पूंजीपतियों के हितो की चिंता कर रही है। सारे आरोपों के जायज आधार हैं? यह भी सत्य है कि इस लोकतंत्र में लोक उपेक्षित हुआ और तंत्र हावी हुआ। लगातार उपेक्षा झेलते-झेलते जनता का बौखलाना लाजिमी भी है। इस प्रकार के अन्य भी बुनियादी सवाल है और इसकी सूची बढ़ सकती है। ये तमाम प्रश्‍न तकनीकी हैं। तकनीकी प्रश्‍नों का उत्तर तकनीकी ही होगा। अगर आदिवासी ‘माओ वाद’ के लिए जिंदा हैं, तो यह एक बड़ा सवाल है। जहां तक नक्सलियों के समर्थक पत्रकार, लेखक और बुद्धिजीवियों का सवाल है, वह देश के खिलाफ नहीं हैं, वह आतंकवाद और अराजकता के खिलाफ हैं। ये उन कारणों के भी खिलाफ हैं, जिनके कारण नक्सलवाद और आतंकवाद पांव पसार रहे हैं। ‘ग्रीन-हंट’ हो या फिर ‘पेपर-हंट’ यह समस्या का सम्पूर्ण समाधान नहीं है। सरकार संवाद के लिए कदम उठाये, संहार के लिए नहीं। सरकार जानती है कि संवाद के लिए माहौल कैसे बनाया जाय। वाजिब सवालों के प्रति सरकार सजगता दिखाये। वनोपज और खनिज संपदा पर कम्पनियों की लगी गिद्ध-दृष्टि और इसकी दावेदारी को खारिज करने की सरकार घोषणा करे। सरकार स्वयं ‘डाॅक’ में है। आम लोगों का भरोसा लगातार टूट रहा है। सरकार की जन विरोधी नीतियां जब तक नहीं रुकेंगी, तब तक जन संघर्षों या नक्सलवाद से निपटना मुश्किल ही होगा।
-विजयेन्द्र

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1 comments:

Sanjiv Kavi said...

बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |

बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर

सनसनाते पेड़
झुरझुराती टहनियां
सरसराते पत्ते
घने, कुंआरे जंगल,
पेड़, वृक्ष, पत्तियां
टहनियां सब जड़ हैं,
सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |

बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
तड़तड़ाहट से बंदूकों की
चिड़ियों की चहचहाट
कौओं की कांव कांव,
मुर्गों की बांग,
शेर की पदचाप,
बंदरों की उछलकूद
हिरणों की कुलांचे,
कोयल की कूह-कूह
मौन-मौन और सब मौन है
निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
और अनचाहे सन्नाटे से !

आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
महुए से पकती, मस्त जिंदगी
लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
जंगल का भोलापन
मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
कहां है सब

केवल बारूद की गंध,
पेड़ पत्ती टहनियाँ
सब बारूद के,
बारूद से, बारूद के लिए
भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।

फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

बस एक बेहद खामोश धमाका,
पेड़ों पर फलो की तरह
लटके मानव मांस के लोथड़े
पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
दर्द से लिपटी मौत,
ना दोस्त ना दुश्मन
बस देश-सेवा की लगन।

विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
अपने कोयल होने पर,
अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर
आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कलम से

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