शिक्षित भी बेरोजगार, ऐसा क्यों ?

इस युग की समस्याओं में बेकारी की समस्या प्रधान मानी जा सकती है। थोड़ी बहुत यह समस्या संसार के सभी देशों में है। अमेरिका, इंगलैण्ड और रूस जैसे देश भी इसके शिकंजे से बाहर नहीं है, वैसे विकासशील देशों के सिर पर इस समस्या का दानवी आतंक बहुत ज्यादा है, जो कि उनकी वर्षों की पराधीनता के फलस्वरूप उत्पन्न हुई परिस्थितियों एवं उनकी असंतुलित आबादी-वृद्धि के कारण उनके समुचे विकास को खाए जा रहा है। इस समस्या को जन्म देने वाले कारण तो अनेक हैं, पर सबसे बड़ा कारण है आबादी में तेज रफ्तार से होने वाली वृद्धि। यह समस्या उन देशों के सामने उतनी ही विकराल होकर खड़ी है, जिनकी आबादी जितनी अधिक है। आज युवक को पढ़-लिख कर भी बेकार होने का भय बना रहता है। इसी व्याप्त भय के कारण पढ़े लिखे युवक तत्कालिक लाभ के लिए अपराधिक कृत्यों की ओर मुखातिब होते है और दिन प्रतिदिन अपराधिक घटनाओं में अपार वृद्धि हो रही है। यह समस्या बाढ़ तथा भूकम्प की तरह अचानक देश के सामने नहीं आ गई हैं, इस समस्या की जिम्मेवार हमारी सरकार है, जो आज तक इस समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है। आज से 43 वर्ष पूर्व 1967 में जब रुड़की विश्वविद्यालय से प्रशिक्षित अभियंताओं ने समवेत स्वर में कहा कि हमें भाषण नहीं नौकरी चाहिए। तब प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी निरूत्तर हो गयी थी। कई इंजीनियरों ने समारोह का बहिष्कार भी कर दिया था। आज स्थिति उससे बदतर हो गई है, एक अनुमान के मुताबिक प्रति वर्ष हमारे देश में नौ लाख बेरोजगार होते हैं। आखिर नौ लाख बेरोजगार की फौज तैयार करने के पीछे कौन सी परिस्थितियां या तत्व जिम्मेदार हैं। यदि हम जिम्मेदार कारणों पर नजर दौड़ाएं तो प्रथम दोष शिक्षा पद्धति में ही दिखता है। हमारी शिक्षा पद्धति इतनी दोष पूर्ण है कि यह स्वावलंबी बनाना सीखाती ही नहीं। इंजीनियरिंग, मेडिकल और अन्य तकनीकी शिक्षाओं के अलावा जो शिक्षा हमारे देश में दी जाती है वह किताबी ज्ञान से साक्षात्कार कराती है। कहीं से भी यह शिक्षा पद्धति हमारे देश की परिस्थिति के अनुकूल नहीं है। दूसरा दोष है बेहिसाब बढ़ती जनसंख्या। प्रतिवर्ष भारत की जनसंख्या ढाई-तीन करोड़ बढ जाती है। फिर यह स्वभाविक है कि रोजगार चाहने वाले व्यक्तियों की संख्या में भी इसी अनुपात में वृद्धि होगी। हमारे देश में लघु उद्योग-धंधों को प्रोत्साहन देने के बजाय बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों की स्थापना पर आरंभ से ही जोर दिया गया है। जबकि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बुनियादी तालीम पर बल देते हुए कुटीर उद्योग को इस देश के लिए परम उपयोगी बताया था। लेकिन आजादी के इतने वर्ष बीतने के बाद भी सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। कहने के लिए भारत सरकार ने बैंको के राष्ट्रीयकरण तथा विभिन्न कार्यक्रमों जैसे 20 सुत्री कार्यक्रम, नया ग्रामीण नियोजन कार्यक्रम, युवकों को स्वनियोजन के लिए दिया जाने वाला प्रशिक्षण कार्यक्रम आदि के द्वारा इस दिशा में काफी प्रयास किया है, परंतु ये व्यवस्थाएं एवं प्रयास सराहनीय होते हुए भी अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सके। कोई कह सकता है कि आबादी तो चीन की भी भारत जैसी है, बात सही है पर यह भी सही है कि चीन ने अपने देश के विकास कार्यो एवं उत्पादन कार्यो के साथ अपने देश की आबादी को जिस हद तक, तथा जिस सफलता के साथ एक दूसरे को जोड़ दिया है यह काबिले तारीफ है। उस सफलता के साथ हमारे देश में यह कार्य नहीं हो सका। हमारे देश में कागजी तथा भाषण बाजी के आधार पर तो कार्य हर वर्ष किसी और देशों से ज्यादा होता रहता है, पर जमीनी हकीकत कुछ और ही है। आज किसी भी पद पर नियुक्ति के लिए यदि दस सीटें निकलती हैं, तो वहंा पचास हजार युवक पहंुचते हैं। बेकारी की इस समस्या का कारगर समाधान ढूंढनें के लिए इसके सभी पक्षों पर अच्छी तरह गौर करना होगा। स्वयं प्रतिनियुक्ति चाहने वाले लघू-उद्यमियों को कठोर निगरानी में हर संभव प्रोत्साहन देना होगा। साथ ही विभिन्न भागों के नैसर्गिक साधनों के अनुरूप गृह एवं कुटीर उघोगों का जाल भी फैलाना होगा। तभी इस विशाल देश को इस भयंकर समस्या से छुटकारा मिल सकता है। अन्यथा यह समस्या ज्यौं की त्यौं बनी रहेगी।

-संजय कुमार मिश्रा

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