कब थमेगी उत्तराखंड के जंगलों की आग

उत्तराखण्ड के जंगलों में आग से हर साल बेशकीमती पेड़-पौधे, जड़ी-बूटियां, वन- सम्पदा और जीव-जंतु आग की भेट चढ़ रहें हैं और उत्तराखंड सरकार कुम्भकरण की नींद सो रही हैं। जंगलो की सुरक्षा और आग से रक्षा के लिए हर वर्ष करोड़ों रुपये सरकार खर्च करती है। वहीं वन विभाग अपनी लापर वाही से बाज नहीं आ रहा है। यहीं यदा-कदा इसका असर पानी के स्रोतों पर भी पड़ रहा है। ‘जल-जंगल-जमीन’ उत्तराखण्ड की धरोहर हैं। देश की इस अनुपम धरोहर को अग्नि में इस तरह स्वाह होने से जीव-जन्तु मात्र ही नहीं अपितु वन-सम्पदा भी खाक होती जा रही है। इस साल दावानल की घटना 24 मार्च को हुई। तब से प्रदेश आग की भेंट चढ़ा हुआ है। इस तरह की अब तक कुल 110 घटनाएं हो चुकी हैं। इस आग से करीब 250 हेक्टेयर जंगल खाक हो चुका है। गढ़वाल क्षेत्र में 53 घटनाएं और कुमाऊं क्षेत्र में कुल 22 घटनाएं अभी तक दर्ज हो गई हैं। कई हेक्टेयर वन भूमि आग की चपेट में आ चुकी है। इसके अलावा वाइल्ड लाइफ की 35 घटनाएं घट चुकी हैं। पिछले साल की अपेक्षा इस साल आग ने ज्यादा तबाही मचाई है। इसके बावजूद प्रशासन और विभाग नहीं चेता। यही वजह है कि हर वर्ष घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो रही है। देखा जाए तो वन विभाग के पास वनाग्नि को काबू करने के लिये कोई ठोस कार्य-योजना एवं आवश्यक संसाधन नहीं हैं जिसकी वजह से कई गांव भी आग की चपेट में आने लगे हैं। विगत दिनों मुख्यालय पौड़ी के जंगलों में लगी भीषण आग ने कंडोलिया बाजार की तीन दुकानें एवं पांच घरों को अपने आगोश में ले लिया। भरी दोपहर में लगी इस आग पर काबू पाने के लिये न तो वन विभाग और न ही जिला प्रशासन के पास आवश्यक संसाधन थे। आग बढ़ती रही और प्रशासन एवं विभाग मौन रहे। यही नहीं इस घटना के तीन दिन बाद इसी जिले के कोट प्रखंड के बंडु और लसेरा गांव में भी तीन मकान जल कर खाक हो गये। कड़ी मशक्कत के बाद स्कूली छात्रों एवं ग्रामीणों ने आग बुझायी। सबसे हैरत की बात यह है कि गढ़वाल मंडल की कमिश्नरी कहे जाने वाले पौड़ी में फायर बिग्रेड की महज एक ही गाड़ी मौजूद थी, जो इस भीषण आग को बुझाने में नाकाफी साबित हुई। इन दिनों भीषण आग की चपेट में पौड़ी के अलावा चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी एवं उत्तरकाशी जिले प्रमुख हैं। जहां कई हेक्टेयर वन भूमि दावानल की भेंट चढ़ चुके हैं। रुद्रप्रयाग जनपद के रिजर्व फारेस्ट, सिविल फारेस्ट सहित कई वन पंचायतों की वन भूमि इसकी चपेट में है। जिला मुख्यालय से सटे रतूडा क्षेत्र के जंगल तथा दरम्वाडी, अखोडी, फलई, गिंवाला के जंगलों में लाखों की वन संपदा खाक हो चुकी है। यही हाल टिहरी जिले के चंबा से लगे अदवाणी एवं उत्तर काशी जिले के कोटियाल गांव, गणेशपुर के जंगल का भी है। यहीं के लम्बगांव, बाल गंगा, एवं भिलंगना के जंगलों का तो यह हाल है कि इनके संरक्षण के लिये अब तक कोई विभाग ही नहीं बना है। चमोली जिले में देवाल धरातल्ला क्षेत्र, मल्ला, दशोली, नन्दप्रयाग, बिरही सहित कई क्षेत्रों में भी आग ने अपना विकराल रूप दिखाया है। पर्यावरण से जुडे़ राजेन्द्र सिंह बताते है कि विभाग की वनाग्नि सुरक्षा सहित तमाम जागरुकता कार्यक्रमों का यहां असर दिखायी नहीं दे रहा है और वनों में आग की घटनायें फायर सीजन शुरू होने से पहले ही होने लगी है। विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले उत्तराखण्ड में कम से कम दो से चार वन प्रभाग हैं। भारी भरकम फील्ड स्टाफ के साथ इनके मुखिया, विभागों में डीएफओ रैंक के अधिकारी भी तैनात हैं। उसके बावजूद पर्यावरण की रक्षा में ये सबकुछ नाममात्र ही हैं। इन घटनाओं ने ठंडे मुल्क का तापमान बढ़ा दिया है। अब आपदाओं से निपटने के लिये सरकार की ओर से बाकायदा एक आपदा प्रबंधन विभाग भी खोला गया है। वन विभागों को हाईटेक करने की बात कही गई है ताकि आपदा के समय त्वरित कार्रवाई की जा सके। संरक्षण तथा संवर्धन के लिये बाकायदा ग्रामीण स्तर पर वन पंचायतें भी बनायी गयी हैं। इन्हें समय-समय पर आर्थिक सहायता भी दी जाती है, जिससे वे वन पंचायत क्षेत्र के अधीन वृक्षारोपण के साथ-साथ, संरक्षण में अहम भूमिका निभाएं। लेकिन इसके बावजूद सरकारी उपक्रम और प्रयास ठीक-ठाक नहीं दिखते। जंगलों की आग सच बयान कर देते हैं कि सरकार इन आपदाओं से निपटने के लिये कागजी घोड़े पर सवार होकर आग से जंग जीतना चाहती है पर जमीनी हकीकत ठीक इसके विपरीत है। दरअसल विभागों में आवश्यक संसाधन की कमी साफ दिखाई देती है। जिलों में आग पर काबू के लिए एकाध फायर ब्रिगेड की गाड़ियां ही मौजूद हैं जिनमें फायर सीजन शुरू होने से पूर्व ही पेयजल की किल्लत अहम है। बीते दिनों पौड़ी के कंडोलिया बाजार में लगी आग इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। अच्छी खबर यह है कि हाल ही में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने ‘ग्रीन इंडिया’ कार्यक्रम करने का ऐलान किया है। इस कार्यक्रम के तहत वन संरक्षण एवं सुदृढ़ीकरण को बढ़ावा दिये जाने की बात कही। प्रदेश सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए आपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी है। प्रदेश सरकार ने इस प्रोजेक्ट को ‘कैंपा’ नाम दिया है। केन्द्र ने प्रदेश में वनाग्नि की गंभीरता को देखते हुए आठ सौ सैंतीस करोड़ रुपये जारी कर दिये हैं। ‘कैंपा’ प्रोजेक्ट के तहत इस राशि से प्रदेश सरकार वनाग्नि सुरक्षा उपकरणों की खरीद, कॉरीडोर का विकास, प्रदेश में बांज क्षेत्रों का विकास, वन पंचायतों के सुदृढ़ी करण एवं सीमांकन जैसे कार्य करेगी। यह राशि वन भूमि हस्तांतरण एवं एनपीवी के अलावा अन्य माध्यमों से एकत्रित धन का कुछ हिस्सा मात्र है। पहले से ही वनाग्नि में झुलस रहे प्रदेश के जंगल को इससे कितनी निजात मिलेगी, यह देखना अभी बाकी है।


-सुदर्शन रावत

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