महिला सशक्तिकरण का मतलब क्या है?

अंग्रेजी के समाचार पत्र ‘दि हिन्दू’ से जुड़ीं पत्रकार सेवंती निनान ने 4 अप्रैल, 2010 के मैगजीन सेक्षन में विभिन्न चैनलों द्वारा प्रसारित किए जा रहे धारावाहिकों का विश्‍लेषण प्रस्तुत करते हुए महिला सशक्तिकरण के लोक प्रिय नारे पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण पर छिड़ी बहस के कारण यह मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण हो गया है कि प्रमुख समय पर प्रसारित होने वाले सभी धारावाहिकों मे ऐसी कहानियां परोसी जा रही है, जो सशक्ति करण की कल्पना का भयंकर विरोधाभास हैं। सीधा संदेश देने वाली ये कहानियां समय की घड़ी को बहुत पीछे ले जाने का खतरा उपस्थित करती हैं। उनका कहना है कि इन घारावाहिकों की लोक प्रियता को देखते हुए यह कहना पड़ता है कि दर्शकों के मन पर इनका जो प्रभाव पड़ता है, उसमें सशक्तिकरण का विचार तो कहीं छूता भी नहीं है। सभी धारावाहिकों में जिन चीजों का चित्रण तड़क-भड़क के साथ और कैमरे को लंबे समय तक फोकस कर किया जाता है, वे सब स्त्रियों को गुलामी में जकड़ने वाली होती हैं और जिनका विरोध तमाम समाज-सुधार आंदोलनों में तथा स्त्री-स्वतंत्रता के आंदोलनों में होता रहा है। एक प्रकार से इन सारे धारावाहिकों की थीम तमाम समाज-सुधार आंदोलनों का विरोध होती है, भले ही हर प्रस्तुति के अंत में यह घोषणा की जाती थी कि हमारा उद्देश्‍य स्त्रियों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाना तथा उनके अधिकारों की रक्षा करना है। अक्सर इन धारावाहिकों में जिन बातों को हाईलाईट किया जाता है और महिमा मंडित किया जाता है, वे होती हैं: विवाहों की वे रस्में तथा कर्मकांड जो स्त्रियों को गुलाम बनाते हैं। गहनों, चूड़ियों, भड़कीली पोशाकों और श्रृंगार-प्रसाधनों का प्रदर्शन, जो हमेशा स्त्रियों की कमजोरी रही हैं। करबाचौथ और उसी तरह के व्रत- त्यौहार, जो पति को परमेश्‍वर और पत्नी को गुलाम मानने का विचार संप्रेशित करते हैं। जहां स्त्रियों के सशक्तिकरण की बहसों में स्त्रियों के घर से बाहर निकलने और विभिन्न क्षेत्रों में काम करने पर जोर दिया जाता है, ये धारावाहिक स्त्रियों को घर की चैखट के भीतर बांधने तथा उनके कार्य-क्षेत्र को घर तक ही सीमित करने की प्रत्यक्ष-परोक्ष कोशिश करते हैं। इन कहानियों का सारा संघर्ष घर की सत्ता पर कब्जा करने के लिए होता है। घरेलू हिंसा में क्रूरता और पाशविकता की सारी सीमाओं को लांघा जाता है। स्त्रियों को दो रूपों में प्रस्तुत किया जाता है। या तो उन्हें देवियों के रूप में चित्रित किया जाता है, जो असह्य वेदना, घोर आत्याचार को सहन करते हुए भी क्षमा और त्याग की मूर्ति बनी रहती है, या उसे घृणित चुड़ैल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो दुष्‍टता और क्रूरता की किसी भी सीमा तक जा सकती है। औरत ही औरत की दुश्‍मन है, इस घिसी-पीटी धारणा को प्रायः सभी धारा- वाहिकों में पुष्‍ट किया जाता है। जैसे खाप पंचायतों के न्याय में बलात्कार करने वाले को उसी लड़की से शादी करने को मजबूर कर दंडित किया जाता है, उसी तरह एक धारावाहिक में रोज छेड़खानी करने वाले गुंडे से शादी कर लड़की अपनी इज्जत की रक्षा करती है। स्त्री पर अत्याचार ढाने, उसे अपमानित करने, उसे अधिक से अधिक घोर यातना सहते दिखाने और सामंती समाज के सड़े-गले मूल्यों को महिमा मंडित करने का ही काम ये धारावाहिक सुनियोजित और सुविचारित ढंग से कर रहे हैं। इसके बावजूद बाजार के मूल्यों से चालित कुछ संस्थाएं इन धारावाहिकों को विकास और प्रगति की आकांक्षाओं की सहज अभिव्यक्ति सिद्ध करने में लगी है, जबकि यह सब उन मूल्यों का बैकलैश है, जो स्त्रियों की प्रगति और मुक्ति के लिए आवश्‍यक माने जाते रहे है।
मीडिया के प्रभाव और प्रस्तुत कार्यक्रमों की लोकप्रियता का सर्वेक्षण करने वाली संस्थाएं इस आधार पर इन धारावाहिकों में दिखाई जाने वाली विषय-वस्तु का समर्थन करती है कि लोग इन्हें देखते और पसंद करते हैं। लेकिन लोगों के पास पसंद-नापसंद करने का अधिकार ही कहां होता है? टेलीविजन का माध्यम ही एकतरफा संप्रेषण का माध्यम होता है। इसमें जो दिया जाता है वह लेना पड़ता है, वरना भूखे रहना पड़ता है। प्राइम टाइम में जब प्रत्येक पारिवार को मनोरंजन की जरूरत होती है, उसे जो मिलता है, वह लेना ही पड़ता है वरना टेलीविजन बंद करने का मतलब होता है घर में कलह। लेकिन जैसे सब से ज्यादा बिकने पर भी गंदे साहित्य पर रोक लगाने की कोशिश की जाती है, वैसी कोशिश इन स्त्री-विरोधी और सभ्यता विरोधी धारावाहिकों पर रोक लगाने की कोशिश कोई नहीं करता। यह कोशिश सभी प्रबुद्ध नागरिकों और बुद्धिजीवीयों को करनी चाहिए, किंतु उनसे भी अधिक यह जिम्मेदारी उन प्रगतिशील महिलाओं पर आती है, जो महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए प्रयत्नशील हैं। यह माना जा सकता है कि संसद और विधान सभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का आंदोलन चलाने वाली महिलाएं इस कोशिश में सबसे आगे रहेंगी, क्योंकि ये धारावाहिक महिला सशक्तिकरण की हर संकल्पना का उपहास हैं। किंतु आश्‍चर्य है कि इनके विरुद्ध न तो संसद में आवाज सुनाई दे रही है और न संसद से बाहर। यह स्थिति तब है जब केंद्रीय सरकार की असली बागडोर और प्रतीकात्मक नैतिक बागडोर महिलाओं के हाथ में है। संसद की अध्यक्ष भी महिला है और विपक्ष की नेता भी। इसके अलावा राजधानी की मुख्यमंत्री भी महिला है, तथा महिला सांसदों की संख्या भी अधिक नहीं तो 12 प्रतिशत तो है ही। यदि इतनी शक्ति पास होने पर भी महिलाएं इन धारावाहिकों के फूहड़पन को नियंत्रित नहीं कर सकतीं तो विधान मंडलों में महिलाओं की एक तिहाई उपस्थिति से क्या उम्मीद की जा सकती है? हाल ही में उच्चतम न्यायलय ने सुशमा नाम की एक लड़की के मामलों में विचित्र व्यवस्था दी है। इस लड़की ने अपने से छोटी जाति के लड़के से अंतर्जातीय और अंतप्र्रांतीय विवाह किया था। इस पर उसके भाई ने अपनी बहन के पति, ससुर और दो अल्पवय बच्चों की हत्या कर दी और अन्यों को घायल कर दिया। गर्भवती सुषमा इसलिए बच गई, क्योंकि वह उस समय एक संबंधी के यहां गई थी। महाराष्ट्र की सेशन कोर्ट ने हत्यारे दिलीप को फांसी की सजा सुनाई थी और उच्च न्यायालय ने उसकी पुष्टि की थी। उच्चतम न्यायालय ने फांसी की सजा को 25 साल की कैद की सजा में बदल दिया। इसके लिए जजों ने जो तर्क दिया वह अजीब है। अगर उन्होंने फांसी की सजा को इसलिए खत्म किया होता कि मृत्युदंड व्यापक मानवीय दृष्टि से उचित नहीं है, तो फैसले पर आपत्ति करने की कोई वजह नहीं होती। किंतु न्यायालय ने जो व्यवस्था दी वह खाप पंचायतो की व्यवस्था से मिलती जुलती है। न्यायालय ने कहा: यह आम बात है कि जब छोटी बहन कोई असामान्य कदम उठाती है (जैसे यह अंतर्जातीय विवाह और गुप्त प्रेम) तो समाज में बड़े भाई को ही उचित या अनुचित तरीके से इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है कि उसने इसे नहीं रोका। अगर वह गलत किंतु सच्ची जाति- भावना का शिकार हो जाता है तो उसे मृत्युदंड देना उचित नहीं होगा। जाति, समुदाय, धर्म की विशाक्त भावनाएं यद्यपि बिल्कुल अनुचित हैं, तथापि यह वास्तविकता है। क्या इस तर्क से खाप पंचायतों की ‘सम्मान-हत्या’ (ंआॅनर किलिंग) का औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता? करीब आधी सदी पूर्व पूना के एक जज ने इसी तरह के केस में व्यवस्था दी थी कि लड़की द्वारा जाति की सीमा को लांघना गलत था। यदि महिला सशक्तिकरण के आंदोलन इस तरह की घटनाओं पर प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते तो महिला सशक्ति करण के आंदोलनों की उपादेयता ही क्या रह जाती है?


-मस्तराम कपूर

Category:
Reactions: 

0 comments:

Post a Comment