राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून गरीब जनता के साथ मजाक है

भारत जिस तेजी के साथ विकासशील देशों की जमात में आगे बढ़ रहा है, उसे देखते हुए शायद ही किसी को भारत को उभरती हुई शक्ति मानने में संदेह हो। लेकिन उभरती शक्ति के इस उजली तस्वीर का एक स्याह पहलू भी है, वह है यहाँ लगातार बढ़ रही भुखमरी और कुपोषण की समस्या। लेकिन फिर भी सरकार है कि इस सच पर आँखें मूदे बैठी है। सरकार की ऐसी ही एक गरीब विरोधी योजना ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून’ के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश भर से आए लगभग 5000 लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। यह धरना रोजी-रोटी अधिकार अभियान के तहत किया गया। अभियान के संयोजकों का कहना है कि हमेशा की तरह इस बार भी सरकार खाद्य सुरक्षा के नाम पर जनता के साथ धोखा कर रही है। सरकार बीपीएल परिवारों को 3 रुपये किलो के हिसाब से 25 किलो अनाज देने को इस कानून की सबसे बड़ी उपलब्धि बता रही है, जबकि यह सबसे बड़ा छल है। सरकार देश की कुपोषण की समस्या को नजरअंदाज करके महज 25 किलो भोजन का चारा फेंक रही है। यह पूरी तरह से समाज के अलग-अलग वर्गों की बहुपक्षीय खाद्य सुरक्षा को अनदेखा करने का मामला है। उप सहारा प्रदेशों से भी बदतर कुपोषण की समस्या को झेल रहे देश में यह मसौदा एक घटिया मजाक है। यह मसौदा माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भोजन के अधिकार मामले में दिए गए निर्णयों की खुली अवमानना है। सर्वोच्च न्यायालय अपने आदेशों के जरिये हर परिवार को 35 किलो राशन, वंचित परिवारों के लिए अन्त्योदय अन्न योजना के तहत और सस्ता राशन, शिशुओं के लिए आइसीडीएस के तहत पूरक पोषण आहार, मातृत्व सहायता योजना और जननी सुरक्षा योजना के तहत खाद्य सुरक्षा की व्यवस्था देता है। सिर्फ बीपीएल आबादी को 25 किलो सस्ते अनाज का यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून वस्तुतः ‘खाद्य असुरक्षा कानून’ है। भोजन का सर्वव्यापी अधिकार ही भारत में सभी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। सरकार ऐसी किसी सम्भावना को खर्चे की अधिकता का नाम देकर नकार देती है। साथ ही सरकार का कहना है कि सरकार के पास 35 किलो अनाज देने के लिए पर्याप्त भंडार नहीं है। सरकार का तर्क है कि लगभग आधी आबादी को 35 किलो अनाज देने में 75,000 करोंड़ का खर्च आयेगा, जबकि 77 प्रतिशत को यह सुविधा देने पर 1,00,000 करोंड़ का खर्च आयेगा। एक साथ न सही, लेकिन सरकार चरणबद्ध तरीके से अपनी ईमानदार मंशा तो जाहिर करे। जब तक देश में कुपोषण खत्म न हो जाये, तब तक अनाज निर्यात पर पूरा प्रतिबंध होना चाहिए। सरकार पर्याप्त मात्रा में धन न होने का बहाना बना कर इन मांगों की तरफ ध्यान नहीं देती, जबकि सच्चाई यह है कि बीते साल ही सरकार ने उद्योगपतियों के 4,18,096 करोड़ रुपये के कर माफ कर दिए। हर साल 1 लाख करोड़ रुपये की टैक्स चोरी होती है। इसकी तुलना में सरकार नरेगा के लिए केवल 39,000 करोड़ और सस्ते अनाज के लिए 55,000 करोड़ रुपये आवंटित करती है। सरकार को यह सोचना चाहिए कि केवल बातों और वादों से गरीब का पेट नहीं भरता, पेट भरने के लिए भोजन जरूरी है। इसके लिए सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे सभी को भोजन मिल सके। इस तरह के कानून के जरिये रोटी का टुकड़ा फेंकने से राजनीति को तो लाभ हो सकता है, लेकिन गरीब, बेहाल और बदहाल जमात को कोई लाभ नहीं होने वाला है। सरकार को इस ‘खाद्य असुरक्षा कानून’ को संशोधित करना ही होगा। जनता अपनी आवाज को बुलंद करती रहेगी।

-शहनाज

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1 comments:

Fauziya Reyaz said...

bilkul sahi kaha aapne...agreed

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