ध्रुवों पर छटपटाती बेटियां

मैंने उनसे पूछा था वे कहाँ तक पढ़ना चाहती हैं और क्या बनना चाहती हैं? अपने मोहल्ले-पड़ोस की लडकियों की तरफ एक नजर डाल कर, हाथ की उँगलियों को आपस में फँसाकर थोडा-सा शरमाते हुए वह बोली, ‘ मैं आठवीं तक री पडाई करणा चांऊ।’ यह कह लेने के बाद बैठते हुए उसके चेहरे ऐसी खुशी व संतुष्टि थी, मानो मुराद आधी तो मुझे यह बता कर ही पूरी हो गई। ‘इंजीनियर क्या करता है, पता है?’ मैंने पूछा। एक असमंजस भी चुप्पी तोड़ कर उसने जवाब दिया, ‘जिब बणँूगी अपणे आप पड़ जावैगा।’ फिर दूसरी लड़की भी कुछ-कुछ पहली वाली के ही अंदाज में बोली, ‘मैं आठवीं तक री पड़ाई कारणा चाऊँ और डाक्टर बणना चाऊँ।’ बाकी लड़कियों ने भी मिलते-जुलते-से ही जवाब दिये थे। कुछ आठवीं और बाकी दसवीं तक ही पढ़ना चाहती हैं। सिर्फ एक लड़की ने कहा कि वह बारहवीं पास करना चाहती है। ये लड़कियाँ राजस्थान के बाड़मेर जिले की हाथमा पंचायत की हैं, जिन्हें पाँचवी तक पढ़ा कर घर बैठा लिया गया है। हो सकता है यह पढ़ कर आपको हँसी आ जाए कि ये लड़कियां आठवीं तक पढ़ कर इंजीनियर और दसवीं तक पढ़ कर डाॅक्टर बनना चाहती हैं। सूचना तकनीक के चरम युग में हम सोच सकते हैं कि इन्हें इतना भी नहीं पता कि...? पर जिस जगह और माहौल में ये लड़कियाँ रह रही हैं उनके लिए जिंदा रहना ही बड़ी बात है, फिर सपने देखने और पढ़ाई-लिखाई की बात सोचने के लिए तो बहुत हिम्मत चाहिए। 400 परिवारों की आबादी वाले पूरे गाँव में इन्सानों और पशुओं के लिए सिर्फ चार नल हैं। गर्मी के दिनों में एक-दो में ही पानी आता है। हालांकि पिछले वर्षों में आई बाढ़ के कारण जल स्तर की स्थिति अभी काफी बेहतर है। दिन के किसी भी पहर में लड़कियों के झुंड आपको हैंडपंप चलाते या मटकों और टोकनियों में पानी ढोते मिल जाएँगे। बाकी समय में चूल्हा गर्म करने के लिए लकड़ियाँ बीनना, बकरी/भेड़ चराना या फिर उनके लिए चारा लाने के काम पढ़ने और अपने लिए कुछ सोचने का वक्त ही किसके पास है? ऐसे में डाॅक्टर या इंजीनियर बनने की बात करना वैसे ही है, जैसे कोई कहने लगे, मैं चाँद पर घर बनाऊँ तो कई बीघे में आम का बाग लगाऊँ। वहाँ न बंदर तंग करेंगे, न ही आदमी। असल में इन लड़कियों के लिए आठवीं-दसवीं की पढ़ाई कर पाना भी डाॅक्टरी पढ़ने से कम नहीं है। ये लड़कियाँ कल्पना भी कर सकतीं कि उनके गाँव से लगभग 600 किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसी मायावी दुनिया है, जहाँ लड़कियां बारहवीं से भी बहुत आगे तक पढ़ती हैं, जहाँ लड़कियां न सिर्फ लड़कों की तरह घर से बाहर निकलती हैं, घूमती -फिरती हैं, उनकी तरह कपड़े पहनती हैं, उनके साथ हँसी-ठिठोली करती हैं, बल्कि नौकरी भी करती हैं। जहाँ सड़कांे पर इतनी गाड़ियां हैं कि आगे बढ़ने की जगह मुश्किल से मिलती है। जहां महलों जैसे आलीशान अस्पताल हैं। जहाँ धरती के ऊपर और नीचे रेल चलती है। जहाँ लगभग सभी आदमी-औरतों के हाथ में बिना तार का फोन है। जहाँ इंटरनेट है, जिससे आप पूरी दुनिया में किसी से बात कर सकते हैं, अपने रिश्तेदारों को देख कर उनसे गप्पें मार सकते हैं। जहाँ पोस्टकार्ड और नीले लिफाफे की जगह अब इंटरनेट से चिठ्ठी भेजी जाती है और वह पलक झपकते ही पहुंच जाती है। दूसरी ओर दिल्ली में रहने वाली लड़कियां ही कहां सोच सकती हैं कि सिर्फ छह सौ किलोमीटर की दूरी पर लड़कियों के दिन की शुरूआत और अंत दो तीन किलोमीटर की दूरी से सिर पर पानी ढोने से होता है। जहां लड़कियों के लिए दसवीं बाहरवीं करना ऐसा है, जैसे एमबीबीएस या एमबीए की डिग्री मिलना। जहां नवजात बच्चियों की नाक पर रेत की पोटली रख कर या फिर अफीम चटा कर उन्हें मार डाल जाता है। जहां लड़कियां गांव से बाहर पहली बार अपनी शादी में ही निकलती है। जहां पैड के लिए किसी कपड़े का प्रयोग तब तक किया जाता है, जब तक वह धुल-धुल कर ख्ुाद की फट नहीं जाता। जहां एडल्ट होने से पहले टीनएज में ही लड़कियां मां बन जाती हैं। जहां स्कूल में दिन भर पेशाब रोककर बैठना होता है, क्योंकि लड़कियों के लिए कोई टाॅयलेट या बाथरूम नहीं है। और इस सबसे ज्यादा बहुत कुछ है जो सिर्फ भोगनेवाला ही जानता है। सोचती हूं इस धरती पर उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के अलावा भी असंख्य ध्रुव पर रहने वाले, दूसरे ध्रुव के जीवन के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकते। आश्चर्य व अफसोस यह है कि संचार क्रांति के युग में भी सिर्फ कुछ सौ किलोमीटर दूरी ही दो घ्रुवों के बीच की सी दूरी है। इस दिल्ली नामक ध्रुव के वासियों के लिए सिर्फ 600 किलोमीटर दूर बसे लोगों के जीवन के बारे में जानना किसी अन्य ग्रह से आए जीव के बार में जानने जैसा है। सूचना क्रांति के युग में भी हम एक दूसरे से कितना अनजान हैं, कितने दूर हैं लंदन, सेन फ्रांसिस्को, सिडनी, यूके, यूएस, चीन, जापान, इटली, इंग्लैंड कुछ भी तो हमारी नजरों से दूर, हमारी जानकरी से दूर नहीं। लाखों करोड़ों किलोमीटर दूर बसे देशों-शहरांे के लोगों को हम जान रहे हैं लेकिन ये कुछ सौ किलोमीटर की दूरी हम जिंदगी भर नहीं नाप पाते। क्यों? बाड़मेर शहर की लगभग तीन लाख की आबादी में जहां महिला गायनोकालाॅजिस्ट सिर्फ एक है, वहां (भ्रुण के लिंग का पता लगानेवाली) सोनोग्राफी की चार मशीनें हैं- एक सरकारी व तीन प्राइवेट। एक राजपूत महिला ने बताया कि कुछ महीने पहले हुई बेटी की शादी में 20 तोले चांदी दी है, बाकी दहेज के सामान्य सामान से अलग। यह सुनते ही मेरे दिमाग में एनजीओ के आफिस की दीवारों पर लगे बेटी बचाओं के बड़े-बड़े पोस्टर घूम गए। ऐसे कैसे बचेंगी बेटियां? कहां से आएंगी बेटियां, पत्नियां, प्रेमिकाएं, दोस्त, दादी, नानी और मां? क्या विज्ञान कभी इतनी तरक्की कर सकता है कि हमारे लिए बेटियां लैब में पैदा कर दे बिना मांओं के। हम यह कैसे समाज में रह रहें हैं जिसमें हमें दहेज न देने या कम देने पर तो शर्मिंदगी होती है, पर बेटियों को मारने पर नहीं। श्री राजगोपाल सिंह की ये पक्तियां बार-बार जेहन में आती है ‘जिस घर में बेटी नहीं, वो घर रेगिस्तान है।’ यूं भी पानी की कमी से धरती पर रेगिस्तान बढ़ रहा है, बंजर बढ़ रहा है, बचा खुचा रेगिस्तान हम पैदा कर रहे हैं, रेगिस्तान में बेटियों के अभाव में रेगिस्तान, रेगिस्तान में हम.....।
-गायत्री आर्य

साभार: विचार

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