हारे हुए योद्धा के हाथ में कमान

तमाम तरह की अफवाहों- झंझटों से जूझते हुए अंततः भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी ने उत्तर प्रदेश में सूर्य प्रताप शाही के हाथ में भाजपा की कमान सौंप दी है। लगभग मरणासन्न की स्थिति में पहुंच चुकी पार्टी को पुर्न जीवित करने की अभिलाषा को संजोए संगठन के प्रांतीय सेनापति की कमान जिस सूर्य प्रताप शाही के हाथों में सौंपी गयी है उनकी पहचान एक हारे हुए योद्धा की है। फिलहाल प्रदेश में संगठन के सेनापति की भूमिका में अवतरित हुए सूर्य प्रताप शाही संगठन में कितनी जान फूँक पाते हैं यह तो... भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है, लेकिन इस कड़वी सच्चाई से मुँह भी नहीं मोड़ा जा सकता कि प्रदेश संगठन के जितने भी हवा-हवाई कद्दावार नेता है चाहे वे भाग्य के सहारे राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने वाले पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ठाकुर राजनाथ सिंह, जिन्दगी में ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक का कभी कोई चुनाव न लड़ने वाले लेकिन वर्तमान में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर आसीन पं. कलराज मिश्र हों, लखनऊ की राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी के निजी कारिंदे की पहचान रखने वाले सांसद लालजी टंडन हों या फिर जमीनी स्तर पर आधारविहीन लेकिन प्रांतीय संगठन में पिछड़ों के कद्दावार नेता का दम भरने वाले ओमप्रकाश सिंह हो। प्रांतीय संगठन में सबके अपने-अपने गुट हैं और सभी अपने-अपने गुट के प्रदेश सेनापति हैं। प्रदेश भाजपा में टांगखींचू राजनीति का यह खेल वर्तमान में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुका है। परिणामतः संगठन में ‘जूते में दाल बटने की रवायत’ का चलन भी अपने पूरे शबाब पर है। अब ऐसे में नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही प्रदेश के उपरोक्त कथित धुरंधरों एवं धड़ों में बँटे संगठनों के बीच कैसे सामंजस्य स्थापित कर पाते हैं तथा संगठन को एक साथ कैसे खड़ा कर पाते हैं। यह अपने आप में स्वयं एक यक्ष प्रश्न है। उत्तर प्रदेश भाजपा के विषय में इस कड़वे सच से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश भाजपा का ग्राफ 2002 से ही लगातार गिरता जा रहा है और तभी से पार्टी अपना खोया जनाधार पाने के लिए इन आठ वर्षो में अनेकों प्रयोग कर चुकी है। इन प्रयोगों में बजरंगी (बजरंग दल के संयोजक) विनय कटियार से लेकर रमापति राम त्रिपाठी तक का प्रयोग कर पार्टी की दिशा व दशा सुधारने का तमाम तरह का नुख्शा आजमाया जा चुका है। पर अब तक आजमाये गये नुख्शों से पार्टी की सेहत ठीक होना तो दूर की बात रही, उसमें सुधार के लक्षण भी दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं। हाँ, इन आजमाये गये नुख्शों का परिणाम यह जरूर देखने को मिला है कि पार्टी प्रदेश के राजनैतिक समरांगण में दूसरे नम्बर से खिसक कर चैथे नम्बर पर जरूर पहुंच गई है। जिससे संगठन की दिशा और दशा दोनों ही बद से बद्तर हो गई है। अब ऐसी विषम परिस्थिति में नवागंतुक प्रदेश सेनापति सूर्य प्रताप शाही किस हद तक और कैसे सफल हो पाते हैं यह अपने आप में विचारणीय प्रश्न है। उत्तर प्रदेश भाजपा के नये सेनापति सूर्य प्रताप शाही के अब तक के राज नैतिक क्षमता, योग्यता एवं उनके दागदार अतीत को जानना कम दिलचस्प नहीं होगा। प्रदेश भाजपा में ऊपर से लेकर नीचे तक व्याप्त तमाम तरह की विकृतियों को यदि एक तरफ कर दिया जाए तो नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष से किसी तरह के चमत्कार की उम्मीद करना तो और भी बेमानी होगा। क्योंकि प्रदेश भाजपा की बिगड़ी दिशा व दशा को सुधारने के लिए गडकरी ने जिस नये सेनापति सूर्य प्रताप शाही को उत्तर प्रदेश के मोर्चे पर भेजा है उस सूर्य प्रताप शाही के दागदार अतीत को भाजपा का आम कार्यकर्ता आसानी से हजम नहीं कर पाएगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बिहार सीमा से लगे जनपद देवरिया के ग्राम- पकहाँ, थाना- पथरदेवाँ (वर्तमान थाना- बघऊच घाट) के मूल निवासी सूर्य प्रताप शाही ने अपने अब तक के राजनैतिक जीवन में वर्ष 1980 से लेकर 2007 तक कुल नौ चुनावी महासमर के समरांगण में ताल ठोंकी है, जिसमें से मात्र कुल तीन बार ही जीत का सेहरा सूर्य प्रताप शाही के माथे पर बंध सका। यानी 6 बार उन्हें करारी शिकस्त का स्वाद चखना पड़ा है। साक्ष्यों के अनुसार- आर.एस.एस. से सम्बंध सूर्य प्रताप शाही अपने जीवन में पहली बार कसया विधानसभा से 1980 में जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़े, जिनमें इन्हें कुल 2000 मत ही प्राप्त हो सके थे। 1985 के चुनाव में इसी विधानसभा सीट पर अपने निकटतम निर्दल राजनैतिक प्रतिद्वंदी ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को मात्र 250 मतों से पराजित कर जीत का सेहरा बांधने में कामयाब हो सके। जबकि 1989 के आम चुनाव में इसी सीट पर जनता दल के प्रत्याशी ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने लगभग बारह हजार मतों से शाही को पराजित कर 1985 की अपनी पराजय का बदला ले लिया। दो वर्ष बाद हुए चुनाव में ‘रामलहर’ के चलते ही शाही ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को पराजित करने में कामयाब हो सके। जबकि दो वर्ष बाद हुए 1993 के चुनाव में ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने लगभग पन्द्रह हजार मतों से शाही को पराजित कर विधानसभा की ड्योढ़ी लांघने से रोक दिया। आखिरी बार 1996 में जीत हासिल कर विधानसभा की ड्योढ़ी लांघने के बाद अब तक दो बार सम्पन्न हुए चुनाव 2002 एवं 2007 में ब्रह्माशंकर त्रिपाठी प्रदेश भाजपा के इस नये सेनापति को विधानसभा में घुसने से रोके रखा है। 1991 के ‘रामलहर’ चुनाव में चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचे भाजपा के इस महारथी को प्रदेश सरकार में पहली बार ‘गृह राज्यमंत्री’, कुछ दिनों बाद ‘स्वास्थ्य मंत्री’ पद पर आसीन होने का सौभाग्य प्राप्त हो सका तो 1996 में ‘आबकारी मंत्री’ के रूप में शपथ लेकर मंत्री पद पर आसीन हुए। सूर्य प्रताप शाही के मंत्री पद का दोनों कार्यकाल विवादों से बुरी तरह घिरा रहा है। बतौर गृह राज्यमंत्री उनका कार्यकाल तो इतिहास के काले पन्नों में दर्ज है। यहाँ यह ज्ञात रहे कि सूर्य प्रताप शाही के गृहमंत्री के कार्य काल में ही बहुचर्चित ‘पथरदेवाँ बलात्कार काण्ड’ की गूंज लोकसभा से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक बहुत दिनों तक होती रही। पथरदेवाँ काण्ड के विषय में यह भी स्पष्ट हो गया था कि अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी ब्रह्मा शंकर त्रिपाठी को परोक्ष रूप से सबक सिखाने के लिए ही सूर्य प्रताप शाही ने बतौर गृह राज्यमंत्री ‘पथरदेवाँ बलात्कार काण्ड’ को अंजाम दिलवाया था, जिसका कलंक आज भी सूर्य प्रताप शाही के माथे से नहीं छूट पाया है। प्रदेश भाजपा के इस नये कप्तान सूर्य प्रताप शाही के दागदार राजनैतिक इतिहास का इससे बड़ा साक्ष्य और क्या होगा कि - इनके चाचा रविन्द्र किशोर शाही प्रदेश के संविद सरकार में विद्युत मंत्री के रूप में कम जाने जाते थे पर अपने तत्कालीन थाना क्षेत्र- तरकुलवाँ (देवरिया) के ‘बैल चोर सरगना’ के रूप में कुछ ज्यादा ही चर्चित हुए। जिन दिनों सूर्य प्रताप शाही के चाचा रविन्द्र किशोर शाही राज्य के विद्युत मंत्री के रूप में कार्यभार संभाल रहे थे उसी समय तरकुलवाँ थाना के तत्कालीन प्रभारी थानाध्यक्ष- करम हुसैन ने थाने की जी.डी. में लिखा है कि थाना क्षेत्र में बैल चोरी की घटना में इन दिनों की काफी गिरावट इसलिए आई है कि थाना क्षेत्र में बैल चोर गिरोह का सरगना इन दिनों थाना क्षेत्र में रहने के बजाए लखनऊ में रह रहा है। प्रदेश भाजपा के नये सूबेदार सूर्य प्रताप शाही के माथे पर लगे उपरोक्त कलंक (चाहे वह नौ में से छः चुनाव हारने का हो, पथरदेवाँ बलात्कार काण्ड का हो या फिर बैल चोर सरगना से खून के रिश्ते का हो) पर प्रदेश भाजपा मुख्यालय पर लोग चटखारे लेकर चर्चा उसी दिन से शुरू कर दिए हैं, जिस दिन से प्रदेश भाजपा के नये सेनापति के रूप में सूर्य प्रताप शाही के नाम की घोषणा हुई है। अब ऐसे में यह यक्ष प्रश्न स्वतः विचारणीय हो जाता है कि सूर्य प्रताप शाही अपने ऊपर लगे कलंक को धोएंगे या फिर मृत पड़ी प्रदेश भाजपा में जान फूंकने का प्रयास करेंगे।

-एस. ए. अस्थाना
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गडकरी गायब, कौन संभाले गांडीव ?

भाजपा के मुखिया नितिन गडकरी लम्बी छुट्टी पर विदेश गये हुए हैं। विदेश में छुट्टी भी मनेगी और सीख भी लेंगे। तकनीकी क्षेत्र में और ऊर्जा के क्षेत्र में दुनिया में क्या-क्या प्रयोग हो रहे हैं, गडकरी उनसे सीखेंगे। उनकी सीख भारत के लिए कितनी उपयोगी होगी यह तो वक्त बतायेगा। भारत के प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा के मुखिया जो ठहरे। आडवाणी युग का अंत हो चुका है। ‘पीएम इन पाइप लाइन’ के उदेश्‍य पूरे नहीं हुए। इससे ना केवल आडवाणी का सपना टूटा बल्कि पार्टी में उनके वर्चस्व का ढांचा भी ढह गया। अब है नितिन का नूतन युग। पर भाजपाई नितिन के इस नूतन युग से काफी निराश हैं। लालू और मुलायम के प्रति अपमानजनक टिप्पणी को लेकर भाजपा की भद्द पिट गई। गडकरी ने लालू और मुलायम को कांग्रेस का कुत्ता कहा था जिस पर उन्हें माफी मांगनी पड़ी। मुलायम ने तो उन्हें माफ कर दिया पर लालू ने नितिन को कान पकड़ने की कह डाली। भाजपा की छवि बहुत ही शालीन रही है। मर्यादित आचरण और व्यवहार की बात प्रतिनिधि रही है। वाजपेयी, आडवाणी और अन्य कनिष्‍ठ नेता और कार्यकर्र्तायो ने भाषा को लेकर अपनी पहचान बनाये रखी, पर गडकरी ने सब गोबर कर दिया। नितिन के नौसिखियेपन से पार्टी नाहक परेशान हो रही है। अब नेता दबी जुबां से संघ को कोस रहे हैं। देश में नक्सलवाद, जाति आधारित जनगणना, झारखंड में सत्ता समीकरण आदि महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौड़ में देश फंसा है और ये विदेश में हैं। पार्टी में जिन-जिन लोगों को जिम्मेवारी दी गई है उन्हें कोई काम ही नहीं है। खासे बेरोजगार बैठे हैं। गडकरी की अनुपस्थिति में अनन्त कुमार का कद काफी बढ़ गया है। अहम फैसलों में भी किसी की सहमत नहीं ले रहे हैं। एक ओर राहुल और सोनिया गांधी लगातार दौरा कर रहे हैं। दलित-वंचितों की भागीदारी पर बयान दे रहे हैं, दूसरी ओर नितिन गडकरी ने जिन-जिनको सूबेदारी सौंपी है, उनकी समाज में कोई अहमियत नहीं है। ये सभी सामंती चेहरे हैं। चाहे वह सी.पी ठाकुर, प्रभात झा, सूर्यप्रताप साही हो, पार्टी का चेहरा बिल्कुल ही सवर्णवादी है। विजयेन्द्र गुप्ता को दिल्ली का अध्यक्ष बनाया, इससे पुरानी ब्राह्मण-बनियों की पार्टी की छवि बरकरार तो रही पर दलित-वंचित और पिछड़ा आज भी पार्टी से दूर-दूर है। पार्टी लीडर परेशान है इस छवि से। पार्टी लीडर पार्टी को जनाधार वाली पार्टी बनाना चाहते हैं, पर नये ऩिजाम ने पार्टी के लिए जो इंतजाम किया है, उससे जनाधार बढ़ने की बजाय लगातार घटा ही है। पार्टी वर्तमान नेतृत्व से निराश है।


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