पुनर्जन्‍म


''बहुत हुई यह शल्यचिकित्सा कटे हुए अंगों की,
कब तक यूँ तस्वीर संवारें बदरंगी रंगों की.
बीत गया संवाद-समय, अब करना होगा कर्म;
नए समय की नयी जरूरत है ये पुनर्जन्म''
अब समय मात्र संवाद का नहीं रहा.. समय परिवर्तन का है, परिणामोत्पादक
प्रक्रिया का है, परिणाम का है, पुनर्जन्म का है..
'पुनर्जन्म' हर मर चुकी व्यवस्था का, समाज की शेष हो चुकी रूढ़ियों का,
बजबजाती राजनीति का..
बहुत से शेष प्रश्नों को सामने रखने और उन्हें एक तार्किक परिणति तक
पहुँचाने का एक प्रयास...



प्रयास है ये जानने का कि हम हैं कौन?
यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर किसी को नहीं पता..
और आश्चर्य कि कोई जानने का प्रयास भी करता नहीं दिखता..
हर परिचय मृत है.. जो भी लिखेंगे खुद के विषय में वो सब भी उधार का ही तो होगा..
वही होगा जो लोग कहते हैं.. जो लोगों ने ही बनाया है..
सच में क्या है वो तो नहीं ही पता है..
पद है तो वही जो दुनिया से मिला है..
प्रतिष्ठा है वही जो सबने दी है..
और रही बात भूमिका की,
तो भूमिकाएं तलाश रहे हैं अपने हिस्से की..
प्रयास है कि समाज-यज्ञ में अपनी कुछ समिधा लगा सकें..
'पुनर्जन्म' हमारे हिस्से की समिधा का ही एक रूप है..
इसके माध्यम से प्रयास है कि समाज के सुलगते सवालों पर
अपनी और शेष समाज की नज़र को एक मंच दे सकें..
सभी का सहयोग सादर संप्रार्थित है.

visit-

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद
(तस्‍वीर गूगल सर्च से साभार)

हारे हुए योद्धा के हाथ में कमान

तमाम तरह की अफवाहों- झंझटों से जूझते हुए अंततः भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी ने उत्तर प्रदेश में सूर्य प्रताप शाही के हाथ में भाजपा की कमान सौंप दी है। लगभग मरणासन्न की स्थिति में पहुंच चुकी पार्टी को पुर्न जीवित करने की अभिलाषा को संजोए संगठन के प्रांतीय सेनापति की कमान जिस सूर्य प्रताप शाही के हाथों में सौंपी गयी है उनकी पहचान एक हारे हुए योद्धा की है। फिलहाल प्रदेश में संगठन के सेनापति की भूमिका में अवतरित हुए सूर्य प्रताप शाही संगठन में कितनी जान फूँक पाते हैं यह तो... भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है, लेकिन इस कड़वी सच्चाई से मुँह भी नहीं मोड़ा जा सकता कि प्रदेश संगठन के जितने भी हवा-हवाई कद्दावार नेता है चाहे वे भाग्य के सहारे राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने वाले पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ठाकुर राजनाथ सिंह, जिन्दगी में ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक का कभी कोई चुनाव न लड़ने वाले लेकिन वर्तमान में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर आसीन पं. कलराज मिश्र हों, लखनऊ की राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी के निजी कारिंदे की पहचान रखने वाले सांसद लालजी टंडन हों या फिर जमीनी स्तर पर आधारविहीन लेकिन प्रांतीय संगठन में पिछड़ों के कद्दावार नेता का दम भरने वाले ओमप्रकाश सिंह हो। प्रांतीय संगठन में सबके अपने-अपने गुट हैं और सभी अपने-अपने गुट के प्रदेश सेनापति हैं। प्रदेश भाजपा में टांगखींचू राजनीति का यह खेल वर्तमान में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुका है। परिणामतः संगठन में ‘जूते में दाल बटने की रवायत’ का चलन भी अपने पूरे शबाब पर है। अब ऐसे में नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही प्रदेश के उपरोक्त कथित धुरंधरों एवं धड़ों में बँटे संगठनों के बीच कैसे सामंजस्य स्थापित कर पाते हैं तथा संगठन को एक साथ कैसे खड़ा कर पाते हैं। यह अपने आप में स्वयं एक यक्ष प्रश्न है। उत्तर प्रदेश भाजपा के विषय में इस कड़वे सच से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश भाजपा का ग्राफ 2002 से ही लगातार गिरता जा रहा है और तभी से पार्टी अपना खोया जनाधार पाने के लिए इन आठ वर्षो में अनेकों प्रयोग कर चुकी है। इन प्रयोगों में बजरंगी (बजरंग दल के संयोजक) विनय कटियार से लेकर रमापति राम त्रिपाठी तक का प्रयोग कर पार्टी की दिशा व दशा सुधारने का तमाम तरह का नुख्शा आजमाया जा चुका है। पर अब तक आजमाये गये नुख्शों से पार्टी की सेहत ठीक होना तो दूर की बात रही, उसमें सुधार के लक्षण भी दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं। हाँ, इन आजमाये गये नुख्शों का परिणाम यह जरूर देखने को मिला है कि पार्टी प्रदेश के राजनैतिक समरांगण में दूसरे नम्बर से खिसक कर चैथे नम्बर पर जरूर पहुंच गई है। जिससे संगठन की दिशा और दशा दोनों ही बद से बद्तर हो गई है। अब ऐसी विषम परिस्थिति में नवागंतुक प्रदेश सेनापति सूर्य प्रताप शाही किस हद तक और कैसे सफल हो पाते हैं यह अपने आप में विचारणीय प्रश्न है। उत्तर प्रदेश भाजपा के नये सेनापति सूर्य प्रताप शाही के अब तक के राज नैतिक क्षमता, योग्यता एवं उनके दागदार अतीत को जानना कम दिलचस्प नहीं होगा। प्रदेश भाजपा में ऊपर से लेकर नीचे तक व्याप्त तमाम तरह की विकृतियों को यदि एक तरफ कर दिया जाए तो नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष से किसी तरह के चमत्कार की उम्मीद करना तो और भी बेमानी होगा। क्योंकि प्रदेश भाजपा की बिगड़ी दिशा व दशा को सुधारने के लिए गडकरी ने जिस नये सेनापति सूर्य प्रताप शाही को उत्तर प्रदेश के मोर्चे पर भेजा है उस सूर्य प्रताप शाही के दागदार अतीत को भाजपा का आम कार्यकर्ता आसानी से हजम नहीं कर पाएगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बिहार सीमा से लगे जनपद देवरिया के ग्राम- पकहाँ, थाना- पथरदेवाँ (वर्तमान थाना- बघऊच घाट) के मूल निवासी सूर्य प्रताप शाही ने अपने अब तक के राजनैतिक जीवन में वर्ष 1980 से लेकर 2007 तक कुल नौ चुनावी महासमर के समरांगण में ताल ठोंकी है, जिसमें से मात्र कुल तीन बार ही जीत का सेहरा सूर्य प्रताप शाही के माथे पर बंध सका। यानी 6 बार उन्हें करारी शिकस्त का स्वाद चखना पड़ा है। साक्ष्यों के अनुसार- आर.एस.एस. से सम्बंध सूर्य प्रताप शाही अपने जीवन में पहली बार कसया विधानसभा से 1980 में जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़े, जिनमें इन्हें कुल 2000 मत ही प्राप्त हो सके थे। 1985 के चुनाव में इसी विधानसभा सीट पर अपने निकटतम निर्दल राजनैतिक प्रतिद्वंदी ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को मात्र 250 मतों से पराजित कर जीत का सेहरा बांधने में कामयाब हो सके। जबकि 1989 के आम चुनाव में इसी सीट पर जनता दल के प्रत्याशी ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने लगभग बारह हजार मतों से शाही को पराजित कर 1985 की अपनी पराजय का बदला ले लिया। दो वर्ष बाद हुए चुनाव में ‘रामलहर’ के चलते ही शाही ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को पराजित करने में कामयाब हो सके। जबकि दो वर्ष बाद हुए 1993 के चुनाव में ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने लगभग पन्द्रह हजार मतों से शाही को पराजित कर विधानसभा की ड्योढ़ी लांघने से रोक दिया। आखिरी बार 1996 में जीत हासिल कर विधानसभा की ड्योढ़ी लांघने के बाद अब तक दो बार सम्पन्न हुए चुनाव 2002 एवं 2007 में ब्रह्माशंकर त्रिपाठी प्रदेश भाजपा के इस नये सेनापति को विधानसभा में घुसने से रोके रखा है। 1991 के ‘रामलहर’ चुनाव में चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचे भाजपा के इस महारथी को प्रदेश सरकार में पहली बार ‘गृह राज्यमंत्री’, कुछ दिनों बाद ‘स्वास्थ्य मंत्री’ पद पर आसीन होने का सौभाग्य प्राप्त हो सका तो 1996 में ‘आबकारी मंत्री’ के रूप में शपथ लेकर मंत्री पद पर आसीन हुए। सूर्य प्रताप शाही के मंत्री पद का दोनों कार्यकाल विवादों से बुरी तरह घिरा रहा है। बतौर गृह राज्यमंत्री उनका कार्यकाल तो इतिहास के काले पन्नों में दर्ज है। यहाँ यह ज्ञात रहे कि सूर्य प्रताप शाही के गृहमंत्री के कार्य काल में ही बहुचर्चित ‘पथरदेवाँ बलात्कार काण्ड’ की गूंज लोकसभा से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक बहुत दिनों तक होती रही। पथरदेवाँ काण्ड के विषय में यह भी स्पष्ट हो गया था कि अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी ब्रह्मा शंकर त्रिपाठी को परोक्ष रूप से सबक सिखाने के लिए ही सूर्य प्रताप शाही ने बतौर गृह राज्यमंत्री ‘पथरदेवाँ बलात्कार काण्ड’ को अंजाम दिलवाया था, जिसका कलंक आज भी सूर्य प्रताप शाही के माथे से नहीं छूट पाया है। प्रदेश भाजपा के इस नये कप्तान सूर्य प्रताप शाही के दागदार राजनैतिक इतिहास का इससे बड़ा साक्ष्य और क्या होगा कि - इनके चाचा रविन्द्र किशोर शाही प्रदेश के संविद सरकार में विद्युत मंत्री के रूप में कम जाने जाते थे पर अपने तत्कालीन थाना क्षेत्र- तरकुलवाँ (देवरिया) के ‘बैल चोर सरगना’ के रूप में कुछ ज्यादा ही चर्चित हुए। जिन दिनों सूर्य प्रताप शाही के चाचा रविन्द्र किशोर शाही राज्य के विद्युत मंत्री के रूप में कार्यभार संभाल रहे थे उसी समय तरकुलवाँ थाना के तत्कालीन प्रभारी थानाध्यक्ष- करम हुसैन ने थाने की जी.डी. में लिखा है कि थाना क्षेत्र में बैल चोरी की घटना में इन दिनों की काफी गिरावट इसलिए आई है कि थाना क्षेत्र में बैल चोर गिरोह का सरगना इन दिनों थाना क्षेत्र में रहने के बजाए लखनऊ में रह रहा है। प्रदेश भाजपा के नये सूबेदार सूर्य प्रताप शाही के माथे पर लगे उपरोक्त कलंक (चाहे वह नौ में से छः चुनाव हारने का हो, पथरदेवाँ बलात्कार काण्ड का हो या फिर बैल चोर सरगना से खून के रिश्ते का हो) पर प्रदेश भाजपा मुख्यालय पर लोग चटखारे लेकर चर्चा उसी दिन से शुरू कर दिए हैं, जिस दिन से प्रदेश भाजपा के नये सेनापति के रूप में सूर्य प्रताप शाही के नाम की घोषणा हुई है। अब ऐसे में यह यक्ष प्रश्न स्वतः विचारणीय हो जाता है कि सूर्य प्रताप शाही अपने ऊपर लगे कलंक को धोएंगे या फिर मृत पड़ी प्रदेश भाजपा में जान फूंकने का प्रयास करेंगे।

-एस. ए. अस्थाना
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गडकरी गायब, कौन संभाले गांडीव ?

भाजपा के मुखिया नितिन गडकरी लम्बी छुट्टी पर विदेश गये हुए हैं। विदेश में छुट्टी भी मनेगी और सीख भी लेंगे। तकनीकी क्षेत्र में और ऊर्जा के क्षेत्र में दुनिया में क्या-क्या प्रयोग हो रहे हैं, गडकरी उनसे सीखेंगे। उनकी सीख भारत के लिए कितनी उपयोगी होगी यह तो वक्त बतायेगा। भारत के प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा के मुखिया जो ठहरे। आडवाणी युग का अंत हो चुका है। ‘पीएम इन पाइप लाइन’ के उदेश्‍य पूरे नहीं हुए। इससे ना केवल आडवाणी का सपना टूटा बल्कि पार्टी में उनके वर्चस्व का ढांचा भी ढह गया। अब है नितिन का नूतन युग। पर भाजपाई नितिन के इस नूतन युग से काफी निराश हैं। लालू और मुलायम के प्रति अपमानजनक टिप्पणी को लेकर भाजपा की भद्द पिट गई। गडकरी ने लालू और मुलायम को कांग्रेस का कुत्ता कहा था जिस पर उन्हें माफी मांगनी पड़ी। मुलायम ने तो उन्हें माफ कर दिया पर लालू ने नितिन को कान पकड़ने की कह डाली। भाजपा की छवि बहुत ही शालीन रही है। मर्यादित आचरण और व्यवहार की बात प्रतिनिधि रही है। वाजपेयी, आडवाणी और अन्य कनिष्‍ठ नेता और कार्यकर्र्तायो ने भाषा को लेकर अपनी पहचान बनाये रखी, पर गडकरी ने सब गोबर कर दिया। नितिन के नौसिखियेपन से पार्टी नाहक परेशान हो रही है। अब नेता दबी जुबां से संघ को कोस रहे हैं। देश में नक्सलवाद, जाति आधारित जनगणना, झारखंड में सत्ता समीकरण आदि महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौड़ में देश फंसा है और ये विदेश में हैं। पार्टी में जिन-जिन लोगों को जिम्मेवारी दी गई है उन्हें कोई काम ही नहीं है। खासे बेरोजगार बैठे हैं। गडकरी की अनुपस्थिति में अनन्त कुमार का कद काफी बढ़ गया है। अहम फैसलों में भी किसी की सहमत नहीं ले रहे हैं। एक ओर राहुल और सोनिया गांधी लगातार दौरा कर रहे हैं। दलित-वंचितों की भागीदारी पर बयान दे रहे हैं, दूसरी ओर नितिन गडकरी ने जिन-जिनको सूबेदारी सौंपी है, उनकी समाज में कोई अहमियत नहीं है। ये सभी सामंती चेहरे हैं। चाहे वह सी.पी ठाकुर, प्रभात झा, सूर्यप्रताप साही हो, पार्टी का चेहरा बिल्कुल ही सवर्णवादी है। विजयेन्द्र गुप्ता को दिल्ली का अध्यक्ष बनाया, इससे पुरानी ब्राह्मण-बनियों की पार्टी की छवि बरकरार तो रही पर दलित-वंचित और पिछड़ा आज भी पार्टी से दूर-दूर है। पार्टी लीडर परेशान है इस छवि से। पार्टी लीडर पार्टी को जनाधार वाली पार्टी बनाना चाहते हैं, पर नये ऩिजाम ने पार्टी के लिए जो इंतजाम किया है, उससे जनाधार बढ़ने की बजाय लगातार घटा ही है। पार्टी वर्तमान नेतृत्व से निराश है।


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जाति-आधारित जनगणना के समर्थन और विरोध का बिगुल

देश में जाति आधारित जनगणना का काम शुरू हो गया है। न चाहते हुए भी मनमोहन सरकार ने जाति आधारित जनगणना के लिए हामी भरी। देशहित को दांव पर लगाकर सभी जमाती नेतृत्व अपनी-अपनी जमात के हित के लिए पक्ष-विपक्ष में खड़े हो गये। शरद यादव (जद-यू), लालू यादव (राजद), गोपीनाथ मुडे (भा- जपा), मुलायम सिंह यादव (सपा), वीरप्पा मोइली (कांग्रेस), मायावती (बसपा) आदि ने जाति आधारित जनगणना के लिए सरकार पर दबाव डाला। गृहमंत्री चिदम्बरम के विरोध के बावजूद प्रणव मुखर्जी ने प्रधान मंत्री की मौजूदगी में घोषणा की कि जनगणना का आधार जाति ही होगी। बस यथास्थितिवाद के पोषक प्रणेताओं, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि देश में अनर्थ हो जायेगा, देश टूट जायेगा, जातिवाद फिर पनप उठेगा... पिछड़ा, दलित नाजायज सूचना देकर नाजायज फायदा उठायेंगे आदि आदि। जनगणना के फार्म पर लोगों से जाति नहीं लिखने की अपील कर रहे हैं और कह रहे हैं कि जाति के बदले ‘हिन्दुस्तानी’ लिखा जाये। सूचना तकनीक के उफान के इस काल में ‘जात-पात’ की बात करना घिनौना कृत्य है। इससे दुनिया में भारत की छवि खराब होगी। सस्ती लोकप्रियता हासिल करने तथा जात-पात को बनाये रखने वाले ये कथित देश-प्रेमी कौन है? इसके वर्गीय चेहरे को बेनकाब करना जरूरी है। ये भाईचारा चाहते हैं, पर दलित-पिछड़ा केवल ‘चारा’ और ये ‘भाई’ कब तक बने रहेंगे? मुझे उम्मीद थी कि बदलते वक्त के साथ ब्राह्मणवादी ताकत भी अपने भीतर बदलाव लाये होंगे। पर परिणाम निराशा जनक है। ब्राह्मणवाद विवश है, वरना आज भी ये कपार पर चढ़कर मूतने को तैयार हैं। ये मजबूर हैं, पर मिजाज वही पुराना है। इन्होंने अपनी केवल चाल बदली है, चिंतन और चरित्र वही पुराना तुलसीयुगीन वाला है। दलित-पिछड़ों के असीम धैर्य की परीक्षा कब तक ली जाती रहेगी। सदियों की पीड़ा भोगी, जुल्म सहा। इनकी सहनशक्ति इतनी है कि ये उलटकर बदला नहीं ले रहे हैं, यही गनीमत है। देश के 80-85 फीसदी आबादी पर 15 प्रतिशत का शासन...? सदियों से इनके श्रम और संसाधन का भोग? श्रमहीन-कर्महीन ब्राह्मण- संस्कृति का इतिहास क्या छुपा हुआ है? ये दलित पिछड़ा अपना अधिकार लेना चाह रहे हैं किसी के अधिकार का हनन नहीं कर रहे हैं। ब्राह्मण, संस्कृति ने हजारों वर्षों से इनके अधिकार का जो दुरुपयोग किया, उसका हिसाब आखिर कैसे हो? जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी...? अभी तो आरक्षण 50 प्रतिशत ही है, इसे जबकि और बढ़ाने की जरूरत है। इससे काम चलने वाला नहीं है। यह भी 50 प्रतिशत का जो आरक्षण है, वह कहां और कितना मिला, सरकार से ये जातिवादी क्यों नहीं हिसाब लेते। सत्य तो यही है कि अभी तक बैकलाॅग पड़ा है। सीटें खाली पड़ी है। आरक्षण का फायदा है कहां? आज जो भी फायदा दिख रहा है पिछड़ों ने अपनी मेधा, मेहनत और प्रतिभा के बल पर हासिल किया है, न कि आरक्षण के बल पर। आरक्षण को लेकर भी जो हाय तौबा मचा रहे हैं कि देश के मेरिट का नाश हो जायेगा, अयोग्य व्यक्ति को आरक्षण का लाभ मिलेगा तो देश को बेहतर परिणाम कहां से मिलेगा? सत्य है कि जितने इंजीनियर के पूल टूटे हैं, जिन डाक्टरों ने पेट में कैंची छोड़ा, जिसने शिक्षा को बेचा, ये कोई आरक्षण वाले डाक्टर-इंजीनियर नहीं है। उच्च शिक्षण संस्थान से शिक्षा पाकर विदेश भागने वाले सबसे ज्यादा किस जात के हैं? एम.बी.ए और आई. आई. टी. पर खर्च होने वाला लाखों करोड़ों रुपया देश का है। पर इन्हें देश की चिंता नहीं। इन्हें अमेरिका प्यारा है। कहना नहीं पड़ेगा कि अमेरिका में रह रहे 90 प्रतिशत प्रवासी सवर्ण है। कौन कितना देशभक्त और देश द्रोही है, यह सबके सामने है। जाति आधारित जनगणना देश के हित में है और देश की एकता के लिए जरूरी जरूरत है। इसके बिना देश एक कैसे रह सकता है। समान अवसर दिये बिना समानता कैसे आयेगी और समानता के बिना एकता कैसे होगी? समान अवसर देने की घोषणा की असलियत क्या है, इसका खुलासा तो जाति आधारित जनगणना से ही संभव है। बाजारवाद और ब्राह्मणवाद में क्या चरित्रगत अन्तर है। दोनों ही विशमता, शोषण, लोभ और आलस के बल पर आगे बढ़ते हैं। ज्ञान-सत्ता पर दावेदारी आज भी बहाल है। मीडिया मनुवाद का आधुनिक संस्करण है। नीचे से ऊपर तक ये लोग ही कुंडली मारकार क्यों बैठे हैं? केवल इसीलिए कि जातीय हित को कैसे साधा जाय। सत्य है कि जातीयता गंदी है और इसे फैलाने वाले और ही गंदे लोग? जाति खत्म हो पर कैसे? रोटी-बेटी का संबंध बने बिना हम जन गणना फार्म पर ‘हिन्दुस्तानी कैसे लिखेंगे भाई? रोटी-बेटी का संबंध बहाल हो जाय तो आरक्षण को यूं भी खत्म कर देना होगा। रोज ‘मेटरीमोनियल’ में जाति का लड़का खोजा जा रहा है। हर पार्टी चुनाव में जातीय समीकरण बनाती है। जात देखकर पदाधिकारी बनाये जाते हों, तो फिर कैसे कह रहे हैं कि जात-पात खत्म हो गया। देश में जात-पात को खत्म करने में अब भी पिछड़ों की ही भूमिका अहम है। बजबजाती जिन्दगी ये भी नहीं जीना चाहते। पिछड़ों में जातिवाद खत्म करने की क्षमता की बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि ये अब भी प्रतिक्रियावादी नहीं बनें हैं। एक्षन की उम्मीद इसी वर्ग से की जा सकती है। इतिहास गवाह है कि हजारों वर्षों तक यह देश गुलाम क्यों रहा? क्यों मुट्ठी भर आक्रान्ता देश को लूटते रहे? हमारी प्रतिरोधी शक्ति कहां मर गई थी। उत्तर साफ है कि हमारा देश अगड़ो-पिछड़ों में बंटा था, छूत-अछूत से संतप्त था। क्या अब भी हम वही सोच रखते हैं कि भारत का मन आज भी उसी तरह विभाजित रहे और विदेशी हमें लूटता रहे। देश का मतलब केवल भूखंड नहीं है बल्कि वहां रहने वाला जन- गण-मन है। पूरे समाज को मजबूत बनाना ही देशभक्ति है। देशभक्ति का मतलब ही क्या होता है? वक्त है कि काल बाहय, सड़े और मरे हुए विचारों के खोल से अपने को बाहर निकालें। जाति के खिलाफ लड़ाई केवल डाॅयलाॅग से नहीं एक्षन से संभव है। जाति आधारित जनगणना का विरोध एक राष्ट्र-विरोधी कृत्य है, इससे बचना चाहिए।

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डरावने जंगल, मौत की आहटें और कितनी जायेगी जान?

भारत का जंगल खौफनाक है। खौफ ंिहंसक जानवर का नहीं, बल्कि नरभक्षी नक्सलियों का है। सिंह की गर्जना नहीं, बल्कि गनों की आवाज है। सांय.... सांय.... धांय.....धांय..... बस मातमी सन्नाटा और मौतों की आहटें। कौन है ये नरभक्षी? कैसे हो गये नरभक्षी? भर मुंह बोली नहीं, सामने बैठने की हिम्मत नहीं, पेट में रोटी नहीं, तन पर कपड़ा नहीं, बिल्कुल भोला-भाला! फिर क्यों उठायी बंदूकें...? क्या इन्हें कोई बहका रहा है? क्या कोई इन्हें सनका रहा है? दुनिया के इस विषाल लोकतंत्र में क्या इनके लिए कोई जगह नहीं है? आजादी की लड़ाई में तिरंगा इनके खून से भी तो सना था? क्या आदिवासी-समाज हिंसक हो गया है? क्या गौतम और गांधी को ये नहीं जानते? कई चीखते सवाल हमारे सामने हैं। ‘‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, वरना ये आदिवासी इतने बेवफा नहीं होते।’’ लगातार खूनी घटनाएं अंजाम ले रही हैं। लगातार देश के सैनिक मारे जा रहे हैं। कभी 75 तो कभी 8। एक दो के मरने और मारने की बातें तो आम हो गई हैं। लाल कोरीडोर का पैमाना रोज बदल रहा है। जंगल क्या, अब इसकी लपटें मैदान की ओर भी हैं। चारो ओर आंतक का धुंआं। आन्तरिक सुरक्षा के लिए नक्सली सबसे बड़ा खतरा.........! और इसके सफाये के लिए ‘ग्रीन हंट.....।’ सरकार का ‘ग्रीन-हंट’ ज्यों ही आगे बढ़ता है, त्यों ही निर्दोश नौजवानों की शहादत की खबरें सामने आ जाती है। फिर वही घिसे पिटे विरोध, कार्रवाई के स्वर और बहसें। नक्सलियों से बिहार पहले भी तबाह था, अब तबाही और बढ़ गई है। पिछले दिनों बिहार के कई रेलवे ट्रैक विस्फोट से उड़ा दिये गये। भाजपा नेता के घर को उड़ा देने की खबर सुर्खियों में है। इधर बांग्लादेश से माओवादी दस्ता भारत में प्रवेश कर गया है, जिसका परिणाम बहुत ही खतर नाक साबित होने वाला है। नक्सलियों के मुहाने पर दिल्ली है। सरकार को सब पता है। सरकार को पता है कि नक्सलियों का समर्थक वर्ग सिकुड़ा हुआ नहीं है। इसका दायरा लगातार बढ़ रहा है। नक्सल समर्थक बुद्धिजीवियों से भी सरकार निपटने के मूड में है। सरकारी पार्टी भी दो भागों में बंट गई। कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता दिग्विजय सिंह नक्सली समस्या को ‘लाॅ एण्ड आर्डर’ की समस्या नहीं मानते। इधर समाजवादी नेता रघुठाकुर ने कहा कि ‘नक्सली ये तो बतायें कि वे चाहते क्या हैं?’ सरकार वार्ता करे, तो किन से करे। कोई भी पार्टी हिंसा का समर्थन नहीं करती। कई ऐसे नक्सली नेता इतने संवेदनशील दिखाई देते हैं कि कल्पना ही नहीं की जा सकती कि ये हिंसा भी कर सकते हैं? माओवाद की शरण का क्या मतलब? आदिवासियों को माओवाद चाहिये या माओवादियों को आदिवासी की जरूरत है। आजादी के बाद जिस भारत के नवनिर्माण की तैयारी रहनुमाओं पर थी, यह सत्य है कि वे नकारा साबित हुए। जिस मात्रा में विकास होना चाहिये, वह यहां नही हुआ या फिर इस आरोप से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान सरकारें किसी भी पार्टी की हों, जनहित से ज्यादा पूंजीपतियों के हितो की चिंता कर रही है। सारे आरोपों के जायज आधार हैं? यह भी सत्य है कि इस लोकतंत्र में लोक उपेक्षित हुआ और तंत्र हावी हुआ। लगातार उपेक्षा झेलते-झेलते जनता का बौखलाना लाजिमी भी है। इस प्रकार के अन्य भी बुनियादी सवाल है और इसकी सूची बढ़ सकती है। ये तमाम प्रश्‍न तकनीकी हैं। तकनीकी प्रश्‍नों का उत्तर तकनीकी ही होगा। अगर आदिवासी ‘माओ वाद’ के लिए जिंदा हैं, तो यह एक बड़ा सवाल है। जहां तक नक्सलियों के समर्थक पत्रकार, लेखक और बुद्धिजीवियों का सवाल है, वह देश के खिलाफ नहीं हैं, वह आतंकवाद और अराजकता के खिलाफ हैं। ये उन कारणों के भी खिलाफ हैं, जिनके कारण नक्सलवाद और आतंकवाद पांव पसार रहे हैं। ‘ग्रीन-हंट’ हो या फिर ‘पेपर-हंट’ यह समस्या का सम्पूर्ण समाधान नहीं है। सरकार संवाद के लिए कदम उठाये, संहार के लिए नहीं। सरकार जानती है कि संवाद के लिए माहौल कैसे बनाया जाय। वाजिब सवालों के प्रति सरकार सजगता दिखाये। वनोपज और खनिज संपदा पर कम्पनियों की लगी गिद्ध-दृष्टि और इसकी दावेदारी को खारिज करने की सरकार घोषणा करे। सरकार स्वयं ‘डाॅक’ में है। आम लोगों का भरोसा लगातार टूट रहा है। सरकार की जन विरोधी नीतियां जब तक नहीं रुकेंगी, तब तक जन संघर्षों या नक्सलवाद से निपटना मुश्किल ही होगा।
-विजयेन्द्र

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आप क्यों मरना चाहते हैं किसान जी?

पंजाब के किसान अपनी संपन्नता के लिए जाने जाते हैं पर किसान खुदकुशी भी कर हैं, आखिर क्यों? केंद्र सरकार के गले कर्ज के कारण तीन हजार आत्महत्याओं की बात नहीं उतरती तो स्थानीय प्रशासन एफआईआर में खुदकुशी का कारण नशे से लेकर घरेलू कलह तक साबित करने की कोशिश में लग जाता है। पर अब वस्तुस्थिति पता करने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन इंडियन काउंसिल आफ सोशल साइंस रिसर्च (आईसीएसएसआर) के सौजन्य से अपनी तरह का पहला प्रोजेक्ट शुरू किया जा रहा है। इसमें प्रदेश के 18 जिलों का सर्वेक्षण कर किसानों और कृषि मजदूरों के उस वर्ग का पता लगाया जाएगा जो खुदकुशी का रास्ता चुन सकते हैं। इससे पहले इस बात के तो अध्ययन होते रहे हैं कि वे कौन से कारण थे जिनकी वजह से खुदकुशी की गई। लेकिन खुदकुशी की कगार पर कौन खड़ा है अथवा कौन कर सकता है, इसका पता करने का प्रयास कभी नहीं किया गया है। पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के बठिंडा स्थित क्षेत्रीय केंद्र के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर केसर सिंह भंगू ने इस संबंध में ... बताया कि एक जिले में करीब 500 लोगों का चार चरणों में अलग-अलग साक्षात्कार किया जाएगा। इसमें खुदकुशी कर चुके किसान व खेत मजदूर के पीडिघ्त परिवार और वैसे ही हालात से जूझ रहे परिवार के एक-एक सदस्य से मिला जाएगा। ऐसे परिवारों का पता लगाने के लिए पहले चरण में एक सर्वे भी किया जाएगा। जिन गांवों में किसानों ने आत्महत्याएं की हैं उन्हीं गांवों के किसानों से भी साक्षात्कार किया जाएगा। ऐसे लोगों की मजबूरी, इच्छाएं और उम्मीदों का भी पता लगाया जाएगा। रिपोर्ट आने में साल भर का समय लग सकता है। अध्ययन में कर्ज के अलावा सामाजिक पहलुओं, पारिवारिक दबाव और ड्रग्स को भी अलग से रखा गया है। प्रोफसर भंगू के अनुसार इस अध्ययन से भविष्य में बनने वाली नीतियों की रूपरेखा भी तय करने में मदद मिलेगी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का यह प्रयास तनाव भरे हालात से किसानों को निकालने के लिए है। याद रहे कि आईसीएसएसआर के पास ऐसे प्रस्ताव भेजे जाने से पहले पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले संगरूर के लहरा, भवानीगढ़ और अंदाना ब्लाक में ऐसा ही सर्वेक्षण किया गया है। इन क्षेत्रों में सबसे अधिक संख्या में किसान व खेत मजदूरों ने आत्महत्याएं की हैं। पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. लखविंदर सिंह, यूनिवर्सिटी के बठिंडा स्थित क्षेत्रीय केंद्र के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. केसर सिंह भंगू को सबसे अधिक आत्महत्याओं वाली मालवा यानी काटन बेल्ट के तीन जिलों संगरूर, बठिंडा व मानसा में अध्ययन करने का जिम्मा सौंपा गया है। आईसीएसएसआर ने ऐसे ही दो और प्रोजेक्ट पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी लुधियाना और श्री गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर को भी क्रमशः दोआबा व माझा क्षेत्रों के लिए दिए हैं।

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उत्तर प्रदेश में कानून-राज, माया सरकार की बड़ी उपलब्धि

मायावती सरकार के तीन साल पूरे हुए। बंदूकें चमकाने, दादागिरी दिखाने का दौर खत्म हो चुका है। दलित-वंचितों की इज्जत अब सरेआम नीलाम नहीं होगी। चारो-ओर अमन-चैन है। पुलिसिया जुल्म की कहानी अब प्रदेश में कम सुनाई पड़ती है। दलितों के इस दुर्ग में सेंध लगाने की हर कोशिश नाकाम हो रही है। विपक्षी पार्टियां मंुह बाये खड़ी है कि कब माया- सरकार जामुन की तरह टपके। मायावती की निर्भयता से शोषित वंचितों के बीच सुरक्षा बांध बढ़ा है। उपर्युक्त बातें दलित और पिछड़ी जमात की अगुवाई करने वाले हरिनयन सिंह ने कहीं। श्री सिंह ने आगे कहा कि केन्द्रीय सरकार उत्तर प्रदेश के साथ पक्षपात कर रही है। सरकार को विफल करने के लिए समय पर राज्य का अपना हक देने में केन्द्र आनाकानी कर रहा है। साज-सज्जा, रंग-रोंगन पर खर्च कहां हुआ? समाज के पैसे से लालकिला बने, चार मीनार बने, अरबों के मंदिर बने। इतिहास गवाह है कि देश का धन उत्पादन प्रक्रिया में लगाने के बजाय मुगल-गार्डन बनाने में लगाये। देश के राजे-रजवाड़े और मठाधीशों ने क्या-क्या गुल नहीं खिलाये अतीत में। बाबा साहेब अम्बेडकर स्मारक का विरोध करने वाले वर्ग का चेहरा बेनकाव हो चुका है। दलित अपने स्वाभिमान की लड़ाई को जारी रखेगा। उसे रोटी भी चाहिऐ और इज्जत भी। अगड़े-पिछड़े के बीच भाईचारा हो पर ‘भाई’ वह बने और ‘चारा’ हम बनें, यह खेल कबतक चलेगा। श्री सिंह ने आगे कहा कि हमने सदियों का शासन मांगा पर हमारे तीन साल की सत्ता को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है। जिन पाटियों के आजादी के बाद शासन अपने पास रखा और देश को बेच डाला, जबाब तो उसको देना है। देश को बहुराष्ट्रीय निगमों के हाथों नीलाम करने वाली पार्टी को कौन नहीं जानता है। उन्होंने कहा कि मायावती की सत्ता न केवल यूपी में बहाल रहेगी बल्कि अन्य प्रान्तों में भी सांगठनिक फैलाव होगा।


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गडकरी की गडमड, मोल-तोल के बोल

राजनीति अपनी शर्म की हदों के पार निकल रही है। बयानबाजी में कोई शर्म शेष नहीं है। बीती 12 मई की तारीख तो शायद भारतीय राजनीति के इतिहास में बयानों लेकर सबसे ज्यादा शर्मनाक तारीख रही। हद पार करने वाला बयान रहा भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का, गडकरी ने चंड़ीगढ़ में एक सभा को संबोधित करते हुए फिल्मी अंदाज में कहा कि जब भी जी चाहे। नई दुनिया बसा लेते हैं लोग, एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने फिल्मी गीत की यह लाइनें सुनाते हुए मुलायम सिंह और लालू प्रसाद की तुलना कुत्ते से की। गडकरी ने कहा कि मुलायम और लालू वैसे शेर बनते हैं, लेकिन सी बी आई का डंडा चलते ही सोनिया और कांग्रेस की शरण में पहुँच जाते हैं, ये लोग इनके तलवे चाटने वाले हैं, इनके अन्दर विरोध की ताकत नहीं है, एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष का यह बयान तुरंत एक बड़े भूचाल का कारण बन गया, देखते ही देखते बयान आने लगे। गडकरी के बयान के तुरंत बाद समाजवादी नेता अबू आजमी ने उनके बयान की निंदा करते हुए उन्हें ही तलवा चाटने वाला कह डाला। उन्होंने कहा कि यह बात शायद उन्हें नहीं मालूम है कि वे खुद आडवाणी का तलवा चाटकर दिल्ली तक पहुंच पाए हैं। उन्होंने कहा कि हम सभी को यही उम्मीद है कि ऐसे ओछे नेता इसी तरह की बयानबाजी कर सकते हैं। अब ये एक अलग बात है कि अबू आजमी के बयान को देखते हुए उन्हें ओछा कहा जाना चाहिए कि नहीं। सपा की ही अम्बिका चैधरी ने कहा कि गडकरी के बयान पर पूरी भाजपा को शर्मिंदगी होनी चाहिए। हालाँकि उन्होंने अपने बयान के लिए माफी मांग ली है, लेकिन अब खुद उनपर भी एक मुहावरा लागू होता है ‘थूककर चाटना’। अब उन्होंने थूककर चाट लिया है। यह भी सोचने कि ही बात है कि अम्बिका के इस बयान को कितना संसदीय और अच्छा माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह ने कहा कि यह तो बीजेपी की पुरानी रणनीति है। आरएसएस हो या वीएचपी दोनों यही सिखाते हैं कि हमेशा गलत बयानबाजी करके हाईलाइट में रहो। आज तक इन संगठनों ने किसी भी विकास के मुद्दे को नहीं उठाया। उधर दूसरी तरफ हमेशा से बयानों को लेकर विवाद में रहने वाले कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने अपने एक बयान में कहा कि देश में जितनी भी आतंकवादी घटनाएं हुईं उनके लिए वीएचपी और आरएसएस जिम्मेदार है। उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेता आडवाणी को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कहा कि बीजेपी शासन काल में जितनी भी दहशतगर्ती हुई उन सबके पीछे सिर्फ और सिर्फ आडवाणी ही जिम्मेदार हैं।
दिग्विजय के बयान के जवाब में भाजपा के नेता वेंकैया नायडू ने कहा कि अब तो इस तरह की बयानबाजी करना उनकी आदत बन चुकी है, उनका अपने जुबान पर कंट्रोल अब नहीं रहा। उन्होंने कांग्रेस पर तीखा प्रहार करते हुए कहा था कि यूपीए आधी आतंकी है और आधी माओवादी।
राजनीति में अब इस तरह के बयान बहुत बड़ी बात नहीं रही। पिछले साल कांग्रेस की ही रीता बहुगुणा जोशी का मायावती के खिलाफ दिया हुआ विवादास्पाद बयान भी सुर्खियों में रहा था। किसी कि कमीज पर कीचड़ फेंककर अपनी कमीज को ज्यादा साफ दिखाने की यह राजनीति यह जनता अब और बर्दाश्त करने की हालत में नहीं है. परिवर्तन अपेक्षित है।

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खिसकते जनाधार से खिसियाने लगी है भाजपा

भाजपा अपने खिसकते जनाधार से बौखला गई है। वैसे भी भाजपा का यही चरित्र सदैव से रहा है। पार्टी कभी भी दलितों पिछड़ों की समर्थक नहीं रही। दलित समर्थकों के लिए इस पार्टी के मन में सदैव ऐसी भावनाएं रही हैं। हमेशा से दलित-पिछड़ा और मुस्लिम विरोध पार्टी के एजेंडे का हिस्सा रहा है। यह बाते कांग्रेस के युवा किसान नेता शिवशंकर साह ने एक बातचीत में कहीं। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणवादी मानसिकता वाली यह पार्टी कभी भी नहीं चाहती कि पिछड़ी जातियों में उभार हो। पार्टी का चरित्र तो उसी समय स्पष्‍ट हो गया था, जब दलित पार्टी-अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को एक षड़यंत्र के तहत इस पार्टी ने बेईमान साबित कर दिया। यह पार्टी की राजनीति का हिस्सा था, जिससे कि भविष्‍य में दलित- आदिवासी के लिए पार्टी के उच्च पदों के रास्ते हमेशा के लिए बंद हो जाएं। ..और हुआ भी यही। इसके बाद से पार्टी की कोई भी नेतृत्वकारी शक्ति दलित- पिछड़े वर्ग के हाथ में नहीं है। उन्होंने कहा कि जहां कुछ दलित समर्थक हैं भी, वहां भी यह पार्टी उन्हें आवाज उठाने नहीं देती है।। दरभंगा से भाजपा संासद हुकुम देव नारायण को पार्टी की इसी मानसिकता के चलते महिला आरक्षण के मुद्दे पर बोलने की इजाज़त नहीं दी गई। उनकी आवाज को दबा दिया गया। श्री साह ने कहा कि यह पार्टी पूरी तरह ब्राह्मणवादी विचार धारा के पोषक सामंती लोगों की पार्टी बनकर रह गई है। बिहार में सी. पी. ठाकुर, उ. प्र. में भूमिहार जाति के शाही को अध्यक्ष बनाया जाना पार्टी की सामंती सोच की कलई खोलता है। भला इस पार्टी के नेताओं से लालू, मुलायम के सम्मान में कुछ कहने की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है? इस पार्टी से ऐसे ही बयान अपेक्षित हैं। उन्होंने आगं कहा कि इस पार्टी का यह रुख नया नहीं है। पहले भी इस पार्टी ने सोनिया जी को लेकर ऐसा ही किया था। तब पार्टी के सभी बड़े नेता सोनिया जी के खिलाफ जहर उगलने में लगे थे। लेकिन समय के साथ-साथ सोनिया जी ने अपनी लोकप्रियता और नेतृत्वकुशलता के दम पर खुद को एक सशक्त नेत्री के रूप में स्थापित कर लिया। दूसरी ओर युवा नेता राहुल गांधी भी दलितों-पिछड़ों के लिए लगातार संघर्षरत हैं। इन्हीं कारणों से भाजपा को अपना आधार पूरी तरह से खोता लग रहा है। अपने इसी खोते हुए जनाधार के कारण बौखलाहट में इस पार्टी के नेता ऐसे अनाप-शनाप बयान देने में लगे हैं। जनता ऐसे लोगों को जवाब जरूर देगी।

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मजदूरों के लिए कितना सार्थक है मजदूर दिवस

1886 में मजदूरो ने पहली बार शिकागो शहर में रैली निकाली थी, तो उनकी एक ही मांग थी कि ‘‘हमारे काम के घंटे आठ घंटे होने चाहिए’’ पुलिस ने उनके ऊपर गोलीयां चलाई जिसमें कई मजदूर शहीद हुए। अततः उनकी बात मानी गई। काम के घंटे आठ किए गए। उसी की याद में हम ‘मई दिवस’ या ‘मजदूर दिवस’ मनाते है। लेकिन हम महसूस करते है कि मजदूर अन्दोलन के सामने जो समस्याएं उस वक्त थी, इतने सालों के बाद भी जस की तस है। एक अनुमान के मुताबिक 36 करोड़ मजदूर है, जिनके जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं है। इन 36 करोड़ मजदूरो में से 95 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में है। असंगठित क्षेत्र में मजदूरो के लिए न तो कार्य के घंटे निधार्रित है, न ही कोई वेतन आयोग है, उनके लिए न ही काम की निश्चितता है, न ही कोई नियम कानून है। न ही सामाजिक सुरक्षा न काम करने के लिए सुरक्षित माहौल है। सबसे बड़ी बात यह है कि श्रमिको का अभी तक न्यूनतम वेतन ही निधार्रित नहीं किया गया है। इनके हित के लिए बने किसी भी सरकारी कानून को ठीक से लागू नहीं किया जाता है। मजदूर के खिलाफ समूचे देश में शोषण का साम्रज्य कायम है। आज़ादी के साठ सालों के बाद भी उनकी दशा में कोई सुधार नहीं हो पाया है। उनके लिए आज़ादी मिलने और लोकतंत्र का राज कायम होने का कोई मतलब नहीं है, वे आज भी उतने ही शोषित है, जितना गुलामी के दौरान थे। आज कल मजदूर संगठनों का प्रभाव भी घटता जा रहा है, जिसका सबसे बड़ा कारण इन संगठनों का विभाजन है। जो भी राजनीतिक पार्टी का जन्म होता है वह अपने प्रभाव के कारण एक टैªड युनियन को भी जन्म देता है। इसके चलते मजदूर आन्दोलन का राजनीतिक पर बंटवारा हो चुका है। अब इसे जाति के आधार पर बांटा जा रहा है, धर्म के आधार पर बांटा जा रहा है और तो और मजदूरो को शिल्प और श्रेणी के आधार पर भी बांटा जा रहा है। एक तरफ जहा दुनिया के दुसरे देशों में मजदूर संगठन आपस में मिल रहे है, वही हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहां मजदूर संगठनोें को विभाजन किया जा रहा है। आज श्रमिको की सप्लाई माल की तरह की जा रही है। राज्य सरकार के कानूनों को ठेंगा दिखाकर अथवा अधिकारियो से मिलिभगत कर अनेक मजदूरो का शोषण करते है। सरकारी नियमों की धज्जिया उडाते हुए ये तमाम ठेकेदार अधिकारियो की मिलीभगत से मजदूरो का शोषण करते है। इनके वेतन और भते में कटोती करते है। यहा तक की श्रमिको से 12 घंटे की हाड़-तोड़ मेहनत के बावजूद उनको साप्ताहिक अवकाश भी नहीं दिया जाता, उन्हें मूल-भूत सुविधाएं तक नहीं देते जिसमें काम की उचित जगह साफ वातावरण, नियमित चाय-पानी, शौचालय की व्यवस्था आदि शामिल है। अतः राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ अंसगठित क्षेत्र के श्रमिको को संगठित करने के जरुरत है। सूचना का अधिकार तथा उपभोक्ता कानून की तर्ज पर श्रम निरीक्षको पर नजर रखने के लिए संगठन की व्यवस्था होनी चाहिए जिससे ये तय हो सके कि श्रम निरीक्षक अपना कार्य ईमानदारी से कर रहे है या नहीं। एक मई ‘विश्व मजदूर दिवस’ एक आॅपचारिकता न बने और कुछ ठोस निषकर्ष निकले। इसके जरुरी है कि हम श्रम कानूनो का कड़ाई से पालन करे। तभी समाज के इस निम्न वर्ग का भला हो सकता है। जो वास्तविक आधार है इस समाज का, इस देश का, जब तक देश और समाज के इस वर्ग का भला नहीं होगा तब तक कोई भी ताकत इस देश और समाज का भला नहीं कर सकती। कुछ जगहांे पर श्रमिको को जागरुक करने का काम होना चाहिए, वास्तव में मजदूर दिवस मजदूरो को शोषण से मुक्ति दिलवाने का आहाण है। तभी हम मजदूर दिवस को सार्थक बना सकते है।


-Shahnaz Ansari

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पानी की समस्या से जुझते लोग

गर्मी के दस्तक के साथ ही मध्यप्रदेश सरकार ने 36 तहसीलो को सुखा प्रभावित घोषित कर दिया। केवल 8 जिले सामान्य श्रेणी में है, जिससे भोपाल और उज्जैन जिलों के मुख्यलयों पर भी तीन दिन में एक ही जलापूर्ति हो रही है। बुंदेलखंड के सभी जिले जल संकटग्रस्त घोषित कर दिए गए है। उज्जैन का प्यास बुझाने वाला गंभीर बांध मार्च में ही सुख गया था। देवांस में लोग बूंद-बूंद के लिए तरस रहे थे, सो पानी के लिए तरस्ते इंदौर से ही देवांस पानी भेजा जा रहा है। सरकारी आंकडे बातते है कि प्रदेश की सात हजार से अधिक नलकूपे सुख चूके है। इसके अलावा करीब तीस हजार हैडपंप और 1300 से अधिक नलजल योजनाएं बंद पड़ी है। कई जिलों से लोग पलायन कर रहे है। गांवो के अधिकांश लोग रोज 12 से 14 घंटे केवल पानी जुटाने में ही खर्च कर देते है। टैंकर से पानी पहुंचाने के नाम पर तीन सौ करोड़ रूपये की चपत सरकार को लग रही है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जल संकट प्रतिदिन कितना गहराता जा रहा है। दिनोदिन भू-जल स्तर के कम होने से हैंडपंपो से पानी निकलना बंद हो गया है। गौरतलब है कि राज्य में ऐसे लगभग 164 शहर कस्बे है, जहाँ रोज पानी की आपूर्ति लंबे समय से नहीं हो पा रही है। वही ग्रमीण क्षेत्रों में 40000 हैडंपंप दम तोड़ चूके है। पानी को लेकर भोपाल और इंदौर में हत्याओं की घटना भी आम बात बन गई है। इससे भी ज्यादा खराब स्थिति राजस्थान की है। जहाँ पर लोग पानी के लिए एक दुसरे की हत्या करने में भी पीछे नहीं रहते, यहाँ पर सभी वर्गों के नलकूप और तालाब बढ़े हुए है, और कोई व्यक्ति किसी के नल कूप से पानी ले ले तो उस पर पंचायात द्वारा भारी जुर्माना लगाया जाता है। यहाँ के लोग कर्ज तो लेते है पर पैसे का नहीं पानी का कर्ज। लोग अपने-अपने नल कूपो पर ताला लगा कर रखते है। और उसकी रखवाली करते है। यहाँ पानी मंहगा और जान सस्ती है। हालांकि राज्य सरकार जल से निपटने के लिए योजना तो बना रही है पर ये योजनाए कारगर साबित नहीं हो रही है। मालवांचल और उज्जैन की पेयजल संकट के स्थायी समाधान के लिए नर्मदा-क्षिप्रा बांध को जोड़ने के कारगर उपाए किए जा रहे है। लोगो से पानी बचाने की अपील भी की जा रही है। दुनिया में पानी की मात्रा सीमित है। हालांकि हमेशा हमे सुनने को मिलता रहा है कि पानी आसीमित है। संसार में पानी की बहुतायत है और इसलिए मानव जाति ने पानी का हमेशा दुरुपयोग ही किया है। लेकिन 20वीं शताब्दी के अन्त में यह बात सामने आई की पीने योग्य मीठा बहुत ही सीमित है और इसी सीमित पानी से संसार में रहने वाली सभी प्रजातियों को गुजारा करना होगा। वैज्ञानिकों के अनुसार अगले दो दशको में पानी की कमी के कारण हमें जो कुछ भुगतना पड़ सकता है, उसकी फिलहाल कल्पना भी नहीं की जा सकती। अभी संसार में मानव जितना पानी इस्तेमाल कर रहा है अगले दो दशको में यह और अधिक बढ़ेगा। यह इस्तेमाल वर्तमान के मुकाबले 40 प्रतिशत अधिक तक जा सकता है। जबकि ‘‘ग्लोबल एनवायरमेंट आउटलुक’’ की रिपोर्ट के अनुसार 2032 तक संसार की आधी से अधिक आबादी भीषण जल संकट की चपेट में आ जाएगी। पृथ्वी का केवल 2.7 प्रतिशत जल ही पीने के योग्य है। ऐसे में इतनी लापरवाही से इसके उपयोग ने संकट को और भी गहरा दिया है अगर इसके पीछे के कारणों पर नज़र डाले तो न बढ़ती जनसंख्या, बल्कि उघोग धंधों के बढ़ते जाल ने भी इस समस्या को विकट बनाया है। गंगा को जिस रफ्तार से प्रदूषित किया जा रहा है उसके दुस्परिणामों को देखकर ही राजीव गाँधी के शासनकाल में ‘गंगा एक्शन प्लान’ लाया गया था। वह योजना काफी जोर-शोर से शुरु हुई थी, लेकिन परिस्थतियां आज भी जस की तस बनी हुई है। पानी को लेकर इतिहासकार मार्क ट्वेन ने कहा था- पूरा विश्व व्हिस्की पिएगा और पानी के लिए युद्ध लड़े जाएगे, उनका यह कथन इतने वर्षों के बाद भी उतना ही प्रासांगिक है। विशेषज्ञो का मानना है कि अब किसी और मुद्दे पर नहीं, बल्कि पानी के लिए तीसरा विश्वयुद्ध लड़ा जाएगा। ऐसा अनुमान अभी भले ही हमें हास्यापद लगता हो, लेकिन परिस्थितियाँ जिस कदर बिगड़ रही है, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि वह दिन भी अब दूर नहीं।

-Shahnaz Ansari



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ध्रुवों पर छटपटाती बेटियां

मैंने उनसे पूछा था वे कहाँ तक पढ़ना चाहती हैं और क्या बनना चाहती हैं? अपने मोहल्ले-पड़ोस की लडकियों की तरफ एक नजर डाल कर, हाथ की उँगलियों को आपस में फँसाकर थोडा-सा शरमाते हुए वह बोली, ‘ मैं आठवीं तक री पडाई करणा चांऊ।’ यह कह लेने के बाद बैठते हुए उसके चेहरे ऐसी खुशी व संतुष्टि थी, मानो मुराद आधी तो मुझे यह बता कर ही पूरी हो गई। ‘इंजीनियर क्या करता है, पता है?’ मैंने पूछा। एक असमंजस भी चुप्पी तोड़ कर उसने जवाब दिया, ‘जिब बणँूगी अपणे आप पड़ जावैगा।’ फिर दूसरी लड़की भी कुछ-कुछ पहली वाली के ही अंदाज में बोली, ‘मैं आठवीं तक री पड़ाई कारणा चाऊँ और डाक्टर बणना चाऊँ।’ बाकी लड़कियों ने भी मिलते-जुलते-से ही जवाब दिये थे। कुछ आठवीं और बाकी दसवीं तक ही पढ़ना चाहती हैं। सिर्फ एक लड़की ने कहा कि वह बारहवीं पास करना चाहती है। ये लड़कियाँ राजस्थान के बाड़मेर जिले की हाथमा पंचायत की हैं, जिन्हें पाँचवी तक पढ़ा कर घर बैठा लिया गया है। हो सकता है यह पढ़ कर आपको हँसी आ जाए कि ये लड़कियां आठवीं तक पढ़ कर इंजीनियर और दसवीं तक पढ़ कर डाॅक्टर बनना चाहती हैं। सूचना तकनीक के चरम युग में हम सोच सकते हैं कि इन्हें इतना भी नहीं पता कि...? पर जिस जगह और माहौल में ये लड़कियाँ रह रही हैं उनके लिए जिंदा रहना ही बड़ी बात है, फिर सपने देखने और पढ़ाई-लिखाई की बात सोचने के लिए तो बहुत हिम्मत चाहिए। 400 परिवारों की आबादी वाले पूरे गाँव में इन्सानों और पशुओं के लिए सिर्फ चार नल हैं। गर्मी के दिनों में एक-दो में ही पानी आता है। हालांकि पिछले वर्षों में आई बाढ़ के कारण जल स्तर की स्थिति अभी काफी बेहतर है। दिन के किसी भी पहर में लड़कियों के झुंड आपको हैंडपंप चलाते या मटकों और टोकनियों में पानी ढोते मिल जाएँगे। बाकी समय में चूल्हा गर्म करने के लिए लकड़ियाँ बीनना, बकरी/भेड़ चराना या फिर उनके लिए चारा लाने के काम पढ़ने और अपने लिए कुछ सोचने का वक्त ही किसके पास है? ऐसे में डाॅक्टर या इंजीनियर बनने की बात करना वैसे ही है, जैसे कोई कहने लगे, मैं चाँद पर घर बनाऊँ तो कई बीघे में आम का बाग लगाऊँ। वहाँ न बंदर तंग करेंगे, न ही आदमी। असल में इन लड़कियों के लिए आठवीं-दसवीं की पढ़ाई कर पाना भी डाॅक्टरी पढ़ने से कम नहीं है। ये लड़कियाँ कल्पना भी कर सकतीं कि उनके गाँव से लगभग 600 किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसी मायावी दुनिया है, जहाँ लड़कियां बारहवीं से भी बहुत आगे तक पढ़ती हैं, जहाँ लड़कियां न सिर्फ लड़कों की तरह घर से बाहर निकलती हैं, घूमती -फिरती हैं, उनकी तरह कपड़े पहनती हैं, उनके साथ हँसी-ठिठोली करती हैं, बल्कि नौकरी भी करती हैं। जहाँ सड़कांे पर इतनी गाड़ियां हैं कि आगे बढ़ने की जगह मुश्किल से मिलती है। जहां महलों जैसे आलीशान अस्पताल हैं। जहाँ धरती के ऊपर और नीचे रेल चलती है। जहाँ लगभग सभी आदमी-औरतों के हाथ में बिना तार का फोन है। जहाँ इंटरनेट है, जिससे आप पूरी दुनिया में किसी से बात कर सकते हैं, अपने रिश्तेदारों को देख कर उनसे गप्पें मार सकते हैं। जहाँ पोस्टकार्ड और नीले लिफाफे की जगह अब इंटरनेट से चिठ्ठी भेजी जाती है और वह पलक झपकते ही पहुंच जाती है। दूसरी ओर दिल्ली में रहने वाली लड़कियां ही कहां सोच सकती हैं कि सिर्फ छह सौ किलोमीटर की दूरी पर लड़कियों के दिन की शुरूआत और अंत दो तीन किलोमीटर की दूरी से सिर पर पानी ढोने से होता है। जहां लड़कियों के लिए दसवीं बाहरवीं करना ऐसा है, जैसे एमबीबीएस या एमबीए की डिग्री मिलना। जहां नवजात बच्चियों की नाक पर रेत की पोटली रख कर या फिर अफीम चटा कर उन्हें मार डाल जाता है। जहां लड़कियां गांव से बाहर पहली बार अपनी शादी में ही निकलती है। जहां पैड के लिए किसी कपड़े का प्रयोग तब तक किया जाता है, जब तक वह धुल-धुल कर ख्ुाद की फट नहीं जाता। जहां एडल्ट होने से पहले टीनएज में ही लड़कियां मां बन जाती हैं। जहां स्कूल में दिन भर पेशाब रोककर बैठना होता है, क्योंकि लड़कियों के लिए कोई टाॅयलेट या बाथरूम नहीं है। और इस सबसे ज्यादा बहुत कुछ है जो सिर्फ भोगनेवाला ही जानता है। सोचती हूं इस धरती पर उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के अलावा भी असंख्य ध्रुव पर रहने वाले, दूसरे ध्रुव के जीवन के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकते। आश्चर्य व अफसोस यह है कि संचार क्रांति के युग में भी सिर्फ कुछ सौ किलोमीटर दूरी ही दो घ्रुवों के बीच की सी दूरी है। इस दिल्ली नामक ध्रुव के वासियों के लिए सिर्फ 600 किलोमीटर दूर बसे लोगों के जीवन के बारे में जानना किसी अन्य ग्रह से आए जीव के बार में जानने जैसा है। सूचना क्रांति के युग में भी हम एक दूसरे से कितना अनजान हैं, कितने दूर हैं लंदन, सेन फ्रांसिस्को, सिडनी, यूके, यूएस, चीन, जापान, इटली, इंग्लैंड कुछ भी तो हमारी नजरों से दूर, हमारी जानकरी से दूर नहीं। लाखों करोड़ों किलोमीटर दूर बसे देशों-शहरांे के लोगों को हम जान रहे हैं लेकिन ये कुछ सौ किलोमीटर की दूरी हम जिंदगी भर नहीं नाप पाते। क्यों? बाड़मेर शहर की लगभग तीन लाख की आबादी में जहां महिला गायनोकालाॅजिस्ट सिर्फ एक है, वहां (भ्रुण के लिंग का पता लगानेवाली) सोनोग्राफी की चार मशीनें हैं- एक सरकारी व तीन प्राइवेट। एक राजपूत महिला ने बताया कि कुछ महीने पहले हुई बेटी की शादी में 20 तोले चांदी दी है, बाकी दहेज के सामान्य सामान से अलग। यह सुनते ही मेरे दिमाग में एनजीओ के आफिस की दीवारों पर लगे बेटी बचाओं के बड़े-बड़े पोस्टर घूम गए। ऐसे कैसे बचेंगी बेटियां? कहां से आएंगी बेटियां, पत्नियां, प्रेमिकाएं, दोस्त, दादी, नानी और मां? क्या विज्ञान कभी इतनी तरक्की कर सकता है कि हमारे लिए बेटियां लैब में पैदा कर दे बिना मांओं के। हम यह कैसे समाज में रह रहें हैं जिसमें हमें दहेज न देने या कम देने पर तो शर्मिंदगी होती है, पर बेटियों को मारने पर नहीं। श्री राजगोपाल सिंह की ये पक्तियां बार-बार जेहन में आती है ‘जिस घर में बेटी नहीं, वो घर रेगिस्तान है।’ यूं भी पानी की कमी से धरती पर रेगिस्तान बढ़ रहा है, बंजर बढ़ रहा है, बचा खुचा रेगिस्तान हम पैदा कर रहे हैं, रेगिस्तान में बेटियों के अभाव में रेगिस्तान, रेगिस्तान में हम.....।
-गायत्री आर्य

साभार: विचार

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सलवा जुडूम पर नई सोच की जरूरत

अर्थ और उत्पत्ति
छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के लिए आये दिन नक्सली होने के आरोप को झेलना और पुलिसिया अत्याचार को सहना आम बात है। हालात इतने बदतर हो गये हैं कि पुलिस उनको नक्सली समझती है और नक्सली उनको पुलिस का मुखबिर मानते हैं। लिहाजा अपनी बदहाल स्थिति से निजात पाना ही आदिवासियों का शुरू से मूल उद्देश्य रहा है और यह तभी संभव है जब नक्सलियों को वे अपने घर, गाँव से बाहर खदेड़ने में सफल होते हैं। इस संदर्भ में एक अरसे से आतंक और भय के माहौल में जी रहे सीधे-साधे आदिवासियों के प्रतिकार के प्रतीक के रुप में सलवा जुडूम के गठन को देखा जा सकता है। के मधुकर राव के आह्वान पर छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिला के कुतरू ब्लॉक के अम्बेली गाँव में स्वतःस्फूर्त तरीके से सलवा जुडूम संगठन का जन्म 4 जून 2005 में हुआ। अम्बेली गाँव के साथ-साथ आस-पास के अनेक गाँव के लोग, जोकि नक्सल विरोधी थे, इस आंदोलन से जुड़ गये।

आंदोलन
के जनक

के. मधुकर राव पेशे से एक शिक्षक हैं। वे नक्सलियों की हिंसक और नकारात्मक मंशा से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। वे जानते हैं कि नक्सली कभी गरीब आदिवासियों का भला नहीं करेंगे। करोड़ों-अरबों की उगाही से वे सिर्फ अपना भला कर रहे हैं। विकास से उनका कोई लेना-देना नहीं है।

विकास

अपनी स्थापना के साथ ही इस संगठन के सदस्य गाँव-गाँव में जाकर अपने आकार में वृद्वि के लिए प्रयास करने लगे। उनका कारवां आगे बढ़ता गया और लोग इस कारवां का हिस्सा बनते गये। इस कवायद में राजनीतिज्ञ भी इस आंदोलन से जुड़ गए। पुलिस इनको सुरक्षा प्रदान करने लगी। साथ ही पुलिस आदिवासियों को इस आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित भी करने लगी। कालांतर में आंदोलन के पक्ष में स्थिति इतनी सकारात्मक बन गई कि इस आंदोलन के विरोधी भी इससे जुड़ गये। हजारों की संख्या में आदिवासी अपने गाँवों को छोड़कर कैम्प में रहने लगे। दरअसल इस आंदोलन का हिस्सा बनने के बाद उनके लिए गाँव में रहना खतरे से खाली नहीं था। इसलिए उनके लिए जरुरी हो गया था कि वे सुरक्षित जगह पनाह लें। इन कैम्पों में 1 रुपये की दर से सभी को अनाज उपलब्ध करवाया जाता था। जरूरत के मुताबिक उनको नरेगा के तहत मजदूरी भी उपलब्ध करवाई गई। सभी को 35000 रुपये घर बनाने के लिए दिये गए। सभी तरह की स्वास्थ एवं शैक्षणिक सुविधा से कैम्प को सुसज्जित बनाया गया। पूरे राज्य में इस तरह के 23 कैम्पों की स्थापना की गई। 14 बीजापुर जिले में और 9 दंतेवाड़ा जिला में। गंगालुर कैम्प में 600 सलमा जुडूम के समर्थक रहते थे। अब 300 लोग ही इस कैम्प में रहते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे नक्सल प्रभावित इलाकों में तकरीबन डेढ़ लाख सलवा जुडूम समर्थक अपने घर-गाँव छोड़कर कैम्प में रहने के लिए आये थे, जो आज घटकर बीजापुर में 8000 रह गये हैं और दंतेवाड़ा में 35000 एक समय में चर्चित रहा नारा ‘‘सलवा जुडूम जिंदाबाद, नक्सल भगाओ बस्तर बचाओ’’ आज कहीं अंधेरे के गर्त में खो गया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अब शुरुआती दौर की धधकती आग ठंडी हो चुकी है।

पतन

आंदोलन के आगाज के दिनों में सभी कार्यकर्ता अपने निकट संबंधियों की मौत का बदला लेने की भावना से लबरेज थे। उनमें जबर्दस्त उत्साह था। वे पूरी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाना चाहते थे। अपने आंदोलन को वे क्रांति की तरह देखते थे। इस तारतम्य में सलवा जुडूम आंदोलन को उपयोगी बनाने और राज्य सरकार की पुलिस को ताकतवर बनाने के लिए स्पेशल पुलिस ऑफिसियल (एसपीओ) का गठन किया गया। नक्सलियों को कमजोर करने में एसपीओ ने अपनी प्रभावशाली भूमिका भी निभाई, परन्तु उन्हें नक्सलियों के गुस्से को भी झेलना पड़ा। 2006 में गंगालुर गाँव में 7 एसपीओ को बर्बर तरीके से मार डाला गया। आगे भी एसपीओ नक्सलियों के शिकार बनते रहे। इसी बरक्स में बिडम्बना यह है कि इसके एवज में उनको महज 2100 रुपयों की मासिक वेतन मिलता था। हाल ही में उनकी तनख्वाह को 2100 से बढ़ाकर 3000 किया गया है। इसके अलावा इन एसपीओ को कभी किसी पुरस्कार से नवाजा गया और ही उन्हें राज्य की नियमित पुलिस बल में शामिल किया गया। एसपीओ को छोड़ दें तो सलवा जुडूम के सामान्य समर्थक भी हमेशा नक्सलियों का निशाना बनते रहते रहे। सलवा जुडूम को कमजोर करने की रणनीति के तहत ही नक्सलियों ने द्रोणपाल में 30 सलवा जुडूम समर्थकों को लैंडमाईन ब्लॉस्ट के द्वारा उड़ा दिया था। बाद में इस आंदोलन के समर्थक अपना प्रयोजन भूल गये। सलवा जुडूम का भ्रमजाल छीजने लगा। उनपर राजनीति और भ्रष्टाचार हावी हो गया। वे आदिवासियों को इस संगठन से जुड़ने के लिए मजबूर करने लगे। जो लोग अपना घर नहीं छोड़ना चाहते थे, उनको भी ऐसा करने के लिए विवश किया गया। इस आंदोलन के नेता कैम्पों में सरकार द्वारा मुहैया करवाई गई सुविधाओं का दुरुपयोग करने लगे। बहुत सारे नेता मारे गये। इससे लोगों का यह भी भ्रम टूट गया कि कैम्प में रहने से उनकी जिंदगी बची रहेगी। समर्थकों को घर की याद आने लगी, क्योंकि कैम्प में वे अपनी स्वाभाविक जिंदगी को नहीं जी पा रहे थे। कैम्प का जीवन जीने का अनुभव उनके लिए जेल में जीवन जीने के समान था। वे वहाँ अपने रीति-रिवाजों का पालन करने और पर्व-त्यौहारों के उमंग को महसूस करने में असमर्थ थे। आज गंगालुर और चेरपल कैम्प में संगठन के अधिकांश बचे हुए कार्यकर्ताओं के बीच में भारी असंतोश व्याप्त है। उन्होंने संगठन में अपना योगदान गुलामी और जिल्लत की जिंदगी से निजात पाने के लिए दिया था, किन्तु यहाँ आकर उन्हें निराशा के सिवाए कुछ भी हासिल नहीं हुआ। फिलहाल सलवा जुडूम के सदस्य के रुप में उनकी पहचान ने उनका जीना मुहाल कर दिया है। अब वे तो इस घाट के रहे हैं और ही उस घाट के। मंझधार से निकलना उनके लिए असंभव हो गया है।
सलवा जुडूम से होने वाले फायदे
सलवा जुडूम के कारण ही आज छत्तीसगढ़ में अनेकानेक सकारात्मक परिवर्तन आये हैं। नक्सल इलाकों में पुलिस का मुखबिर बेस बढ़ा है। पहले 157 ग्राम पंचायतों में से केवल 70 ग्राम पंचायतों में ही पुलिस की पहुँच थी। आज यह बढ़कर 100 हो गई है। ग्राम पंचायतों में 21वीं शताब्दी की सुविधाएँ पहुँच रही हैं। सड़क के द्वारा गाँव शहर से जुड़ रहे हैं। सरकार की कल्याणकारी योजनाएँ भी धीरे-धीरे गाँवों में प्रवेश कर रही हैं। बासगुड़ा और लिंगागिरि ऐसे गाँव हैं जहाँ पूर्व में नक्सलियों की मजबूत पकड़ थी, पर अब वहाँ उनकी पकड़ ढीली पड़ चुकी है।

प. बंगाल में सलवा जुडूम
भले ही सलवा जुडूम छत्तीसगढ़ में असफल हो गया है। फिर भी उसकी उपयोगिता को खारिज नहीं किया जा सकता है। सलवा जुडूम के प्रणेता के. मधुकर राव अब भी छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के सफाये में सलवा जुडूम की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं। पश्चिम बंगाल में सीपीएम और राज्य सरकार की पुलिस ने मिलकर सलवा जुडूम के गठन की संकल्पना को साकार किया है। डेढ़ साल से इस आंदोलन को मजबूत करने के लिए ताना-बाना बुना जा रहा था और अब यह पूर्ण रूप से सक्रिय हो चुका है। नक्सल प्रभावित जिलों क्रमशः लालगढ़, पुरुलिया और बांकुड़ा में यह फिलवक्त ज्यादा प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है और इसके फायदे भी स्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर हो रहे हैं।

बदलते संदर्भ में उपयोगिता
दंतेवाड़ा में सुरक्षा बल के सदस्यों की नृशंस हत्या के बाद यह जरूरी हो गया है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में ऐसे विकल्प पर विचार किया जाये जो नक्सलियों के सफाये में पुलिस और अर्द्धसैनिक बल को संबल प्रदान कर सके। इस घटना के बाद यह भी पूर्ण रूप से साफ हो गया है कि आदिवासियों या जंगल के बाशिंदो के सहयोग के बिना सरकार नक्सलियों पर कभी काबू नहीं पा सकती है। विकल्पों के संक्रमण के दौर में सलवा जुडूम नक्सल समस्या के समाधान में सहयोगी साबित हो सकता है। अस्तु इस विकल्प को पुनश्चः मजबूत करने की आवश्यकता है, अगर इसे पूर्व में की गई गलतियों से मुक्त कर दिया जाए, तो निश्चित रूप से नक्सलियों का जड़ से सफाया हो सकता है।

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NIRMAN SAMVAD

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