पुनर्जन्‍म


''बहुत हुई यह शल्यचिकित्सा कटे हुए अंगों की,
कब तक यूँ तस्वीर संवारें बदरंगी रंगों की.
बीत गया संवाद-समय, अब करना होगा कर्म;
नए समय की नयी जरूरत है ये पुनर्जन्म''
अब समय मात्र संवाद का नहीं रहा.. समय परिवर्तन का है, परिणामोत्पादक
प्रक्रिया का है, परिणाम का है, पुनर्जन्म का है..
'पुनर्जन्म' हर मर चुकी व्यवस्था का, समाज की शेष हो चुकी रूढ़ियों का,
बजबजाती राजनीति का..
बहुत से शेष प्रश्नों को सामने रखने और उन्हें एक तार्किक परिणति तक
पहुँचाने का एक प्रयास...



प्रयास है ये जानने का कि हम हैं कौन?
यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर किसी को नहीं पता..
और आश्चर्य कि कोई जानने का प्रयास भी करता नहीं दिखता..
हर परिचय मृत है.. जो भी लिखेंगे खुद के विषय में वो सब भी उधार का ही तो होगा..
वही होगा जो लोग कहते हैं.. जो लोगों ने ही बनाया है..
सच में क्या है वो तो नहीं ही पता है..
पद है तो वही जो दुनिया से मिला है..
प्रतिष्ठा है वही जो सबने दी है..
और रही बात भूमिका की,
तो भूमिकाएं तलाश रहे हैं अपने हिस्से की..
प्रयास है कि समाज-यज्ञ में अपनी कुछ समिधा लगा सकें..
'पुनर्जन्म' हमारे हिस्से की समिधा का ही एक रूप है..
इसके माध्यम से प्रयास है कि समाज के सुलगते सवालों पर
अपनी और शेष समाज की नज़र को एक मंच दे सकें..
सभी का सहयोग सादर संप्रार्थित है.

visit-

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद
(तस्‍वीर गूगल सर्च से साभार)

हारे हुए योद्धा के हाथ में कमान

तमाम तरह की अफवाहों- झंझटों से जूझते हुए अंततः भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी ने उत्तर प्रदेश में सूर्य प्रताप शाही के हाथ में भाजपा की कमान सौंप दी है। लगभग मरणासन्न की स्थिति में पहुंच चुकी पार्टी को पुर्न जीवित करने की अभिलाषा को संजोए संगठन के प्रांतीय सेनापति की कमान जिस सूर्य प्रताप शाही के हाथों में सौंपी गयी है उनकी पहचान एक हारे हुए योद्धा की है। फिलहाल प्रदेश में संगठन के सेनापति की भूमिका में अवतरित हुए सूर्य प्रताप शाही संगठन में कितनी जान फूँक पाते हैं यह तो... भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है, लेकिन इस कड़वी सच्चाई से मुँह भी नहीं मोड़ा जा सकता कि प्रदेश संगठन के जितने भी हवा-हवाई कद्दावार नेता है चाहे वे भाग्य के सहारे राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने वाले पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ठाकुर राजनाथ सिंह, जिन्दगी में ग्राम प्रधान से लेकर सांसद तक का कभी कोई चुनाव न लड़ने वाले लेकिन वर्तमान में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर आसीन पं. कलराज मिश्र हों, लखनऊ की राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी के निजी कारिंदे की पहचान रखने वाले सांसद लालजी टंडन हों या फिर जमीनी स्तर पर आधारविहीन लेकिन प्रांतीय संगठन में पिछड़ों के कद्दावार नेता का दम भरने वाले ओमप्रकाश सिंह हो। प्रांतीय संगठन में सबके अपने-अपने गुट हैं और सभी अपने-अपने गुट के प्रदेश सेनापति हैं। प्रदेश भाजपा में टांगखींचू राजनीति का यह खेल वर्तमान में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुका है। परिणामतः संगठन में ‘जूते में दाल बटने की रवायत’ का चलन भी अपने पूरे शबाब पर है। अब ऐसे में नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही प्रदेश के उपरोक्त कथित धुरंधरों एवं धड़ों में बँटे संगठनों के बीच कैसे सामंजस्य स्थापित कर पाते हैं तथा संगठन को एक साथ कैसे खड़ा कर पाते हैं। यह अपने आप में स्वयं एक यक्ष प्रश्न है। उत्तर प्रदेश भाजपा के विषय में इस कड़वे सच से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश भाजपा का ग्राफ 2002 से ही लगातार गिरता जा रहा है और तभी से पार्टी अपना खोया जनाधार पाने के लिए इन आठ वर्षो में अनेकों प्रयोग कर चुकी है। इन प्रयोगों में बजरंगी (बजरंग दल के संयोजक) विनय कटियार से लेकर रमापति राम त्रिपाठी तक का प्रयोग कर पार्टी की दिशा व दशा सुधारने का तमाम तरह का नुख्शा आजमाया जा चुका है। पर अब तक आजमाये गये नुख्शों से पार्टी की सेहत ठीक होना तो दूर की बात रही, उसमें सुधार के लक्षण भी दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं। हाँ, इन आजमाये गये नुख्शों का परिणाम यह जरूर देखने को मिला है कि पार्टी प्रदेश के राजनैतिक समरांगण में दूसरे नम्बर से खिसक कर चैथे नम्बर पर जरूर पहुंच गई है। जिससे संगठन की दिशा और दशा दोनों ही बद से बद्तर हो गई है। अब ऐसी विषम परिस्थिति में नवागंतुक प्रदेश सेनापति सूर्य प्रताप शाही किस हद तक और कैसे सफल हो पाते हैं यह अपने आप में विचारणीय प्रश्न है। उत्तर प्रदेश भाजपा के नये सेनापति सूर्य प्रताप शाही के अब तक के राज नैतिक क्षमता, योग्यता एवं उनके दागदार अतीत को जानना कम दिलचस्प नहीं होगा। प्रदेश भाजपा में ऊपर से लेकर नीचे तक व्याप्त तमाम तरह की विकृतियों को यदि एक तरफ कर दिया जाए तो नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष से किसी तरह के चमत्कार की उम्मीद करना तो और भी बेमानी होगा। क्योंकि प्रदेश भाजपा की बिगड़ी दिशा व दशा को सुधारने के लिए गडकरी ने जिस नये सेनापति सूर्य प्रताप शाही को उत्तर प्रदेश के मोर्चे पर भेजा है उस सूर्य प्रताप शाही के दागदार अतीत को भाजपा का आम कार्यकर्ता आसानी से हजम नहीं कर पाएगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बिहार सीमा से लगे जनपद देवरिया के ग्राम- पकहाँ, थाना- पथरदेवाँ (वर्तमान थाना- बघऊच घाट) के मूल निवासी सूर्य प्रताप शाही ने अपने अब तक के राजनैतिक जीवन में वर्ष 1980 से लेकर 2007 तक कुल नौ चुनावी महासमर के समरांगण में ताल ठोंकी है, जिसमें से मात्र कुल तीन बार ही जीत का सेहरा सूर्य प्रताप शाही के माथे पर बंध सका। यानी 6 बार उन्हें करारी शिकस्त का स्वाद चखना पड़ा है। साक्ष्यों के अनुसार- आर.एस.एस. से सम्बंध सूर्य प्रताप शाही अपने जीवन में पहली बार कसया विधानसभा से 1980 में जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़े, जिनमें इन्हें कुल 2000 मत ही प्राप्त हो सके थे। 1985 के चुनाव में इसी विधानसभा सीट पर अपने निकटतम निर्दल राजनैतिक प्रतिद्वंदी ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को मात्र 250 मतों से पराजित कर जीत का सेहरा बांधने में कामयाब हो सके। जबकि 1989 के आम चुनाव में इसी सीट पर जनता दल के प्रत्याशी ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने लगभग बारह हजार मतों से शाही को पराजित कर 1985 की अपनी पराजय का बदला ले लिया। दो वर्ष बाद हुए चुनाव में ‘रामलहर’ के चलते ही शाही ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को पराजित करने में कामयाब हो सके। जबकि दो वर्ष बाद हुए 1993 के चुनाव में ब्रह्माशंकर त्रिपाठी ने लगभग पन्द्रह हजार मतों से शाही को पराजित कर विधानसभा की ड्योढ़ी लांघने से रोक दिया। आखिरी बार 1996 में जीत हासिल कर विधानसभा की ड्योढ़ी लांघने के बाद अब तक दो बार सम्पन्न हुए चुनाव 2002 एवं 2007 में ब्रह्माशंकर त्रिपाठी प्रदेश भाजपा के इस नये सेनापति को विधानसभा में घुसने से रोके रखा है। 1991 के ‘रामलहर’ चुनाव में चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचे भाजपा के इस महारथी को प्रदेश सरकार में पहली बार ‘गृह राज्यमंत्री’, कुछ दिनों बाद ‘स्वास्थ्य मंत्री’ पद पर आसीन होने का सौभाग्य प्राप्त हो सका तो 1996 में ‘आबकारी मंत्री’ के रूप में शपथ लेकर मंत्री पद पर आसीन हुए। सूर्य प्रताप शाही के मंत्री पद का दोनों कार्यकाल विवादों से बुरी तरह घिरा रहा है। बतौर गृह राज्यमंत्री उनका कार्यकाल तो इतिहास के काले पन्नों में दर्ज है। यहाँ यह ज्ञात रहे कि सूर्य प्रताप शाही के गृहमंत्री के कार्य काल में ही बहुचर्चित ‘पथरदेवाँ बलात्कार काण्ड’ की गूंज लोकसभा से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक बहुत दिनों तक होती रही। पथरदेवाँ काण्ड के विषय में यह भी स्पष्ट हो गया था कि अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी ब्रह्मा शंकर त्रिपाठी को परोक्ष रूप से सबक सिखाने के लिए ही सूर्य प्रताप शाही ने बतौर गृह राज्यमंत्री ‘पथरदेवाँ बलात्कार काण्ड’ को अंजाम दिलवाया था, जिसका कलंक आज भी सूर्य प्रताप शाही के माथे से नहीं छूट पाया है। प्रदेश भाजपा के इस नये कप्तान सूर्य प्रताप शाही के दागदार राजनैतिक इतिहास का इससे बड़ा साक्ष्य और क्या होगा कि - इनके चाचा रविन्द्र किशोर शाही प्रदेश के संविद सरकार में विद्युत मंत्री के रूप में कम जाने जाते थे पर अपने तत्कालीन थाना क्षेत्र- तरकुलवाँ (देवरिया) के ‘बैल चोर सरगना’ के रूप में कुछ ज्यादा ही चर्चित हुए। जिन दिनों सूर्य प्रताप शाही के चाचा रविन्द्र किशोर शाही राज्य के विद्युत मंत्री के रूप में कार्यभार संभाल रहे थे उसी समय तरकुलवाँ थाना के तत्कालीन प्रभारी थानाध्यक्ष- करम हुसैन ने थाने की जी.डी. में लिखा है कि थाना क्षेत्र में बैल चोरी की घटना में इन दिनों की काफी गिरावट इसलिए आई है कि थाना क्षेत्र में बैल चोर गिरोह का सरगना इन दिनों थाना क्षेत्र में रहने के बजाए लखनऊ में रह रहा है। प्रदेश भाजपा के नये सूबेदार सूर्य प्रताप शाही के माथे पर लगे उपरोक्त कलंक (चाहे वह नौ में से छः चुनाव हारने का हो, पथरदेवाँ बलात्कार काण्ड का हो या फिर बैल चोर सरगना से खून के रिश्ते का हो) पर प्रदेश भाजपा मुख्यालय पर लोग चटखारे लेकर चर्चा उसी दिन से शुरू कर दिए हैं, जिस दिन से प्रदेश भाजपा के नये सेनापति के रूप में सूर्य प्रताप शाही के नाम की घोषणा हुई है। अब ऐसे में यह यक्ष प्रश्न स्वतः विचारणीय हो जाता है कि सूर्य प्रताप शाही अपने ऊपर लगे कलंक को धोएंगे या फिर मृत पड़ी प्रदेश भाजपा में जान फूंकने का प्रयास करेंगे।

-एस. ए. अस्थाना
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गडकरी गायब, कौन संभाले गांडीव ?

भाजपा के मुखिया नितिन गडकरी लम्बी छुट्टी पर विदेश गये हुए हैं। विदेश में छुट्टी भी मनेगी और सीख भी लेंगे। तकनीकी क्षेत्र में और ऊर्जा के क्षेत्र में दुनिया में क्या-क्या प्रयोग हो रहे हैं, गडकरी उनसे सीखेंगे। उनकी सीख भारत के लिए कितनी उपयोगी होगी यह तो वक्त बतायेगा। भारत के प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा के मुखिया जो ठहरे। आडवाणी युग का अंत हो चुका है। ‘पीएम इन पाइप लाइन’ के उदेश्‍य पूरे नहीं हुए। इससे ना केवल आडवाणी का सपना टूटा बल्कि पार्टी में उनके वर्चस्व का ढांचा भी ढह गया। अब है नितिन का नूतन युग। पर भाजपाई नितिन के इस नूतन युग से काफी निराश हैं। लालू और मुलायम के प्रति अपमानजनक टिप्पणी को लेकर भाजपा की भद्द पिट गई। गडकरी ने लालू और मुलायम को कांग्रेस का कुत्ता कहा था जिस पर उन्हें माफी मांगनी पड़ी। मुलायम ने तो उन्हें माफ कर दिया पर लालू ने नितिन को कान पकड़ने की कह डाली। भाजपा की छवि बहुत ही शालीन रही है। मर्यादित आचरण और व्यवहार की बात प्रतिनिधि रही है। वाजपेयी, आडवाणी और अन्य कनिष्‍ठ नेता और कार्यकर्र्तायो ने भाषा को लेकर अपनी पहचान बनाये रखी, पर गडकरी ने सब गोबर कर दिया। नितिन के नौसिखियेपन से पार्टी नाहक परेशान हो रही है। अब नेता दबी जुबां से संघ को कोस रहे हैं। देश में नक्सलवाद, जाति आधारित जनगणना, झारखंड में सत्ता समीकरण आदि महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौड़ में देश फंसा है और ये विदेश में हैं। पार्टी में जिन-जिन लोगों को जिम्मेवारी दी गई है उन्हें कोई काम ही नहीं है। खासे बेरोजगार बैठे हैं। गडकरी की अनुपस्थिति में अनन्त कुमार का कद काफी बढ़ गया है। अहम फैसलों में भी किसी की सहमत नहीं ले रहे हैं। एक ओर राहुल और सोनिया गांधी लगातार दौरा कर रहे हैं। दलित-वंचितों की भागीदारी पर बयान दे रहे हैं, दूसरी ओर नितिन गडकरी ने जिन-जिनको सूबेदारी सौंपी है, उनकी समाज में कोई अहमियत नहीं है। ये सभी सामंती चेहरे हैं। चाहे वह सी.पी ठाकुर, प्रभात झा, सूर्यप्रताप साही हो, पार्टी का चेहरा बिल्कुल ही सवर्णवादी है। विजयेन्द्र गुप्ता को दिल्ली का अध्यक्ष बनाया, इससे पुरानी ब्राह्मण-बनियों की पार्टी की छवि बरकरार तो रही पर दलित-वंचित और पिछड़ा आज भी पार्टी से दूर-दूर है। पार्टी लीडर परेशान है इस छवि से। पार्टी लीडर पार्टी को जनाधार वाली पार्टी बनाना चाहते हैं, पर नये ऩिजाम ने पार्टी के लिए जो इंतजाम किया है, उससे जनाधार बढ़ने की बजाय लगातार घटा ही है। पार्टी वर्तमान नेतृत्व से निराश है।


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जाति-आधारित जनगणना के समर्थन और विरोध का बिगुल

देश में जाति आधारित जनगणना का काम शुरू हो गया है। न चाहते हुए भी मनमोहन सरकार ने जाति आधारित जनगणना के लिए हामी भरी। देशहित को दांव पर लगाकर सभी जमाती नेतृत्व अपनी-अपनी जमात के हित के लिए पक्ष-विपक्ष में खड़े हो गये। शरद यादव (जद-यू), लालू यादव (राजद), गोपीनाथ मुडे (भा- जपा), मुलायम सिंह यादव (सपा), वीरप्पा मोइली (कांग्रेस), मायावती (बसपा) आदि ने जाति आधारित जनगणना के लिए सरकार पर दबाव डाला। गृहमंत्री चिदम्बरम के विरोध के बावजूद प्रणव मुखर्जी ने प्रधान मंत्री की मौजूदगी में घोषणा की कि जनगणना का आधार जाति ही होगी। बस यथास्थितिवाद के पोषक प्रणेताओं, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि देश में अनर्थ हो जायेगा, देश टूट जायेगा, जातिवाद फिर पनप उठेगा... पिछड़ा, दलित नाजायज सूचना देकर नाजायज फायदा उठायेंगे आदि आदि। जनगणना के फार्म पर लोगों से जाति नहीं लिखने की अपील कर रहे हैं और कह रहे हैं कि जाति के बदले ‘हिन्दुस्तानी’ लिखा जाये। सूचना तकनीक के उफान के इस काल में ‘जात-पात’ की बात करना घिनौना कृत्य है। इससे दुनिया में भारत की छवि खराब होगी। सस्ती लोकप्रियता हासिल करने तथा जात-पात को बनाये रखने वाले ये कथित देश-प्रेमी कौन है? इसके वर्गीय चेहरे को बेनकाब करना जरूरी है। ये भाईचारा चाहते हैं, पर दलित-पिछड़ा केवल ‘चारा’ और ये ‘भाई’ कब तक बने रहेंगे? मुझे उम्मीद थी कि बदलते वक्त के साथ ब्राह्मणवादी ताकत भी अपने भीतर बदलाव लाये होंगे। पर परिणाम निराशा जनक है। ब्राह्मणवाद विवश है, वरना आज भी ये कपार पर चढ़कर मूतने को तैयार हैं। ये मजबूर हैं, पर मिजाज वही पुराना है। इन्होंने अपनी केवल चाल बदली है, चिंतन और चरित्र वही पुराना तुलसीयुगीन वाला है। दलित-पिछड़ों के असीम धैर्य की परीक्षा कब तक ली जाती रहेगी। सदियों की पीड़ा भोगी, जुल्म सहा। इनकी सहनशक्ति इतनी है कि ये उलटकर बदला नहीं ले रहे हैं, यही गनीमत है। देश के 80-85 फीसदी आबादी पर 15 प्रतिशत का शासन...? सदियों से इनके श्रम और संसाधन का भोग? श्रमहीन-कर्महीन ब्राह्मण- संस्कृति का इतिहास क्या छुपा हुआ है? ये दलित पिछड़ा अपना अधिकार लेना चाह रहे हैं किसी के अधिकार का हनन नहीं कर रहे हैं। ब्राह्मण, संस्कृति ने हजारों वर्षों से इनके अधिकार का जो दुरुपयोग किया, उसका हिसाब आखिर कैसे हो? जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी...? अभी तो आरक्षण 50 प्रतिशत ही है, इसे जबकि और बढ़ाने की जरूरत है। इससे काम चलने वाला नहीं है। यह भी 50 प्रतिशत का जो आरक्षण है, वह कहां और कितना मिला, सरकार से ये जातिवादी क्यों नहीं हिसाब लेते। सत्य तो यही है कि अभी तक बैकलाॅग पड़ा है। सीटें खाली पड़ी है। आरक्षण का फायदा है कहां? आज जो भी फायदा दिख रहा है पिछड़ों ने अपनी मेधा, मेहनत और प्रतिभा के बल पर हासिल किया है, न कि आरक्षण के बल पर। आरक्षण को लेकर भी जो हाय तौबा मचा रहे हैं कि देश के मेरिट का नाश हो जायेगा, अयोग्य व्यक्ति को आरक्षण का लाभ मिलेगा तो देश को बेहतर परिणाम कहां से मिलेगा? सत्य है कि जितने इंजीनियर के पूल टूटे हैं, जिन डाक्टरों ने पेट में कैंची छोड़ा, जिसने शिक्षा को बेचा, ये कोई आरक्षण वाले डाक्टर-इंजीनियर नहीं है। उच्च शिक्षण संस्थान से शिक्षा पाकर विदेश भागने वाले सबसे ज्यादा किस जात के हैं? एम.बी.ए और आई. आई. टी. पर खर्च होने वाला लाखों करोड़ों रुपया देश का है। पर इन्हें देश की चिंता नहीं। इन्हें अमेरिका प्यारा है। कहना नहीं पड़ेगा कि अमेरिका में रह रहे 90 प्रतिशत प्रवासी सवर्ण है। कौन कितना देशभक्त और देश द्रोही है, यह सबके सामने है। जाति आधारित जनगणना देश के हित में है और देश की एकता के लिए जरूरी जरूरत है। इसके बिना देश एक कैसे रह सकता है। समान अवसर दिये बिना समानता कैसे आयेगी और समानता के बिना एकता कैसे होगी? समान अवसर देने की घोषणा की असलियत क्या है, इसका खुलासा तो जाति आधारित जनगणना से ही संभव है। बाजारवाद और ब्राह्मणवाद में क्या चरित्रगत अन्तर है। दोनों ही विशमता, शोषण, लोभ और आलस के बल पर आगे बढ़ते हैं। ज्ञान-सत्ता पर दावेदारी आज भी बहाल है। मीडिया मनुवाद का आधुनिक संस्करण है। नीचे से ऊपर तक ये लोग ही कुंडली मारकार क्यों बैठे हैं? केवल इसीलिए कि जातीय हित को कैसे साधा जाय। सत्य है कि जातीयता गंदी है और इसे फैलाने वाले और ही गंदे लोग? जाति खत्म हो पर कैसे? रोटी-बेटी का संबंध बने बिना हम जन गणना फार्म पर ‘हिन्दुस्तानी कैसे लिखेंगे भाई? रोटी-बेटी का संबंध बहाल हो जाय तो आरक्षण को यूं भी खत्म कर देना होगा। रोज ‘मेटरीमोनियल’ में जाति का लड़का खोजा जा रहा है। हर पार्टी चुनाव में जातीय समीकरण बनाती है। जात देखकर पदाधिकारी बनाये जाते हों, तो फिर कैसे कह रहे हैं कि जात-पात खत्म हो गया। देश में जात-पात को खत्म करने में अब भी पिछड़ों की ही भूमिका अहम है। बजबजाती जिन्दगी ये भी नहीं जीना चाहते। पिछड़ों में जातिवाद खत्म करने की क्षमता की बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि ये अब भी प्रतिक्रियावादी नहीं बनें हैं। एक्षन की उम्मीद इसी वर्ग से की जा सकती है। इतिहास गवाह है कि हजारों वर्षों तक यह देश गुलाम क्यों रहा? क्यों मुट्ठी भर आक्रान्ता देश को लूटते रहे? हमारी प्रतिरोधी शक्ति कहां मर गई थी। उत्तर साफ है कि हमारा देश अगड़ो-पिछड़ों में बंटा था, छूत-अछूत से संतप्त था। क्या अब भी हम वही सोच रखते हैं कि भारत का मन आज भी उसी तरह विभाजित रहे और विदेशी हमें लूटता रहे। देश का मतलब केवल भूखंड नहीं है बल्कि वहां रहने वाला जन- गण-मन है। पूरे समाज को मजबूत बनाना ही देशभक्ति है। देशभक्ति का मतलब ही क्या होता है? वक्त है कि काल बाहय, सड़े और मरे हुए विचारों के खोल से अपने को बाहर निकालें। जाति के खिलाफ लड़ाई केवल डाॅयलाॅग से नहीं एक्षन से संभव है। जाति आधारित जनगणना का विरोध एक राष्ट्र-विरोधी कृत्य है, इससे बचना चाहिए।

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डरावने जंगल, मौत की आहटें और कितनी जायेगी जान?

भारत का जंगल खौफनाक है। खौफ ंिहंसक जानवर का नहीं, बल्कि नरभक्षी नक्सलियों का है। सिंह की गर्जना नहीं, बल्कि गनों की आवाज है। सांय.... सांय.... धांय.....धांय..... बस मातमी सन्नाटा और मौतों की आहटें। कौन है ये नरभक्षी? कैसे हो गये नरभक्षी? भर मुंह बोली नहीं, सामने बैठने की हिम्मत नहीं, पेट में रोटी नहीं, तन पर कपड़ा नहीं, बिल्कुल भोला-भाला! फिर क्यों उठायी बंदूकें...? क्या इन्हें कोई बहका रहा है? क्या कोई इन्हें सनका रहा है? दुनिया के इस विषाल लोकतंत्र में क्या इनके लिए कोई जगह नहीं है? आजादी की लड़ाई में तिरंगा इनके खून से भी तो सना था? क्या आदिवासी-समाज हिंसक हो गया है? क्या गौतम और गांधी को ये नहीं जानते? कई चीखते सवाल हमारे सामने हैं। ‘‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, वरना ये आदिवासी इतने बेवफा नहीं होते।’’ लगातार खूनी घटनाएं अंजाम ले रही हैं। लगातार देश के सैनिक मारे जा रहे हैं। कभी 75 तो कभी 8। एक दो के मरने और मारने की बातें तो आम हो गई हैं। लाल कोरीडोर का पैमाना रोज बदल रहा है। जंगल क्या, अब इसकी लपटें मैदान की ओर भी हैं। चारो ओर आंतक का धुंआं। आन्तरिक सुरक्षा के लिए नक्सली सबसे बड़ा खतरा.........! और इसके सफाये के लिए ‘ग्रीन हंट.....।’ सरकार का ‘ग्रीन-हंट’ ज्यों ही आगे बढ़ता है, त्यों ही निर्दोश नौजवानों की शहादत की खबरें सामने आ जाती है। फिर वही घिसे पिटे विरोध, कार्रवाई के स्वर और बहसें। नक्सलियों से बिहार पहले भी तबाह था, अब तबाही और बढ़ गई है। पिछले दिनों बिहार के कई रेलवे ट्रैक विस्फोट से उड़ा दिये गये। भाजपा नेता के घर को उड़ा देने की खबर सुर्खियों में है। इधर बांग्लादेश से माओवादी दस्ता भारत में प्रवेश कर गया है, जिसका परिणाम बहुत ही खतर नाक साबित होने वाला है। नक्सलियों के मुहाने पर दिल्ली है। सरकार को सब पता है। सरकार को पता है कि नक्सलियों का समर्थक वर्ग सिकुड़ा हुआ नहीं है। इसका दायरा लगातार बढ़ रहा है। नक्सल समर्थक बुद्धिजीवियों से भी सरकार निपटने के मूड में है। सरकारी पार्टी भी दो भागों में बंट गई। कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता दिग्विजय सिंह नक्सली समस्या को ‘लाॅ एण्ड आर्डर’ की समस्या नहीं मानते। इधर समाजवादी नेता रघुठाकुर ने कहा कि ‘नक्सली ये तो बतायें कि वे चाहते क्या हैं?’ सरकार वार्ता करे, तो किन से करे। कोई भी पार्टी हिंसा का समर्थन नहीं करती। कई ऐसे नक्सली नेता इतने संवेदनशील दिखाई देते हैं कि कल्पना ही नहीं की जा सकती कि ये हिंसा भी कर सकते हैं? माओवाद की शरण का क्या मतलब? आदिवासियों को माओवाद चाहिये या माओवादियों को आदिवासी की जरूरत है। आजादी के बाद जिस भारत के नवनिर्माण की तैयारी रहनुमाओं पर थी, यह सत्य है कि वे नकारा साबित हुए। जिस मात्रा में विकास होना चाहिये, वह यहां नही हुआ या फिर इस आरोप से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान सरकारें किसी भी पार्टी की हों, जनहित से ज्यादा पूंजीपतियों के हितो की चिंता कर रही है। सारे आरोपों के जायज आधार हैं? यह भी सत्य है कि इस लोकतंत्र में लोक उपेक्षित हुआ और तंत्र हावी हुआ। लगातार उपेक्षा झेलते-झेलते जनता का बौखलाना लाजिमी भी है। इस प्रकार के अन्य भी बुनियादी सवाल है और इसकी सूची बढ़ सकती है। ये तमाम प्रश्‍न तकनीकी हैं। तकनीकी प्रश्‍नों का उत्तर तकनीकी ही होगा। अगर आदिवासी ‘माओ वाद’ के लिए जिंदा हैं, तो यह एक बड़ा सवाल है। जहां तक नक्सलियों के समर्थक पत्रकार, लेखक और बुद्धिजीवियों का सवाल है, वह देश के खिलाफ नहीं हैं, वह आतंकवाद और अराजकता के खिलाफ हैं। ये उन कारणों के भी खिलाफ हैं, जिनके कारण नक्सलवाद और आतंकवाद पांव पसार रहे हैं। ‘ग्रीन-हंट’ हो या फिर ‘पेपर-हंट’ यह समस्या का सम्पूर्ण समाधान नहीं है। सरकार संवाद के लिए कदम उठाये, संहार के लिए नहीं। सरकार जानती है कि संवाद के लिए माहौल कैसे बनाया जाय। वाजिब सवालों के प्रति सरकार सजगता दिखाये। वनोपज और खनिज संपदा पर कम्पनियों की लगी गिद्ध-दृष्टि और इसकी दावेदारी को खारिज करने की सरकार घोषणा करे। सरकार स्वयं ‘डाॅक’ में है। आम लोगों का भरोसा लगातार टूट रहा है। सरकार की जन विरोधी नीतियां जब तक नहीं रुकेंगी, तब तक जन संघर्षों या नक्सलवाद से निपटना मुश्किल ही होगा।
-विजयेन्द्र

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आप क्यों मरना चाहते हैं किसान जी?

पंजाब के किसान अपनी संपन्नता के लिए जाने जाते हैं पर किसान खुदकुशी भी कर हैं, आखिर क्यों? केंद्र सरकार के गले कर्ज के कारण तीन हजार आत्महत्याओं की बात नहीं उतरती तो स्थानीय प्रशासन एफआईआर में खुदकुशी का कारण नशे से लेकर घरेलू कलह तक साबित करने की कोशिश में लग जाता है। पर अब वस्तुस्थिति पता करने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन इंडियन काउंसिल आफ सोशल साइंस रिसर्च (आईसीएसएसआर) के सौजन्य से अपनी तरह का पहला प्रोजेक्ट शुरू किया जा रहा है। इसमें प्रदेश के 18 जिलों का सर्वेक्षण कर किसानों और कृषि मजदूरों के उस वर्ग का पता लगाया जाएगा जो खुदकुशी का रास्ता चुन सकते हैं। इससे पहले इस बात के तो अध्ययन होते रहे हैं कि वे कौन से कारण थे जिनकी वजह से खुदकुशी की गई। लेकिन खुदकुशी की कगार पर कौन खड़ा है अथवा कौन कर सकता है, इसका पता करने का प्रयास कभी नहीं किया गया है। पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के बठिंडा स्थित क्षेत्रीय केंद्र के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर केसर सिंह भंगू ने इस संबंध में ... बताया कि एक जिले में करीब 500 लोगों का चार चरणों में अलग-अलग साक्षात्कार किया जाएगा। इसमें खुदकुशी कर चुके किसान व खेत मजदूर के पीडिघ्त परिवार और वैसे ही हालात से जूझ रहे परिवार के एक-एक सदस्य से मिला जाएगा। ऐसे परिवारों का पता लगाने के लिए पहले चरण में एक सर्वे भी किया जाएगा। जिन गांवों में किसानों ने आत्महत्याएं की हैं उन्हीं गांवों के किसानों से भी साक्षात्कार किया जाएगा। ऐसे लोगों की मजबूरी, इच्छाएं और उम्मीदों का भी पता लगाया जाएगा। रिपोर्ट आने में साल भर का समय लग सकता है। अध्ययन में कर्ज के अलावा सामाजिक पहलुओं, पारिवारिक दबाव और ड्रग्स को भी अलग से रखा गया है। प्रोफसर भंगू के अनुसार इस अध्ययन से भविष्य में बनने वाली नीतियों की रूपरेखा भी तय करने में मदद मिलेगी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का यह प्रयास तनाव भरे हालात से किसानों को निकालने के लिए है। याद रहे कि आईसीएसएसआर के पास ऐसे प्रस्ताव भेजे जाने से पहले पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले संगरूर के लहरा, भवानीगढ़ और अंदाना ब्लाक में ऐसा ही सर्वेक्षण किया गया है। इन क्षेत्रों में सबसे अधिक संख्या में किसान व खेत मजदूरों ने आत्महत्याएं की हैं। पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. लखविंदर सिंह, यूनिवर्सिटी के बठिंडा स्थित क्षेत्रीय केंद्र के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. केसर सिंह भंगू को सबसे अधिक आत्महत्याओं वाली मालवा यानी काटन बेल्ट के तीन जिलों संगरूर, बठिंडा व मानसा में अध्ययन करने का जिम्मा सौंपा गया है। आईसीएसएसआर ने ऐसे ही दो और प्रोजेक्ट पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी लुधियाना और श्री गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर को भी क्रमशः दोआबा व माझा क्षेत्रों के लिए दिए हैं।

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उत्तर प्रदेश में कानून-राज, माया सरकार की बड़ी उपलब्धि

मायावती सरकार के तीन साल पूरे हुए। बंदूकें चमकाने, दादागिरी दिखाने का दौर खत्म हो चुका है। दलित-वंचितों की इज्जत अब सरेआम नीलाम नहीं होगी। चारो-ओर अमन-चैन है। पुलिसिया जुल्म की कहानी अब प्रदेश में कम सुनाई पड़ती है। दलितों के इस दुर्ग में सेंध लगाने की हर कोशिश नाकाम हो रही है। विपक्षी पार्टियां मंुह बाये खड़ी है कि कब माया- सरकार जामुन की तरह टपके। मायावती की निर्भयता से शोषित वंचितों के बीच सुरक्षा बांध बढ़ा है। उपर्युक्त बातें दलित और पिछड़ी जमात की अगुवाई करने वाले हरिनयन सिंह ने कहीं। श्री सिंह ने आगे कहा कि केन्द्रीय सरकार उत्तर प्रदेश के साथ पक्षपात कर रही है। सरकार को विफल करने के लिए समय पर राज्य का अपना हक देने में केन्द्र आनाकानी कर रहा है। साज-सज्जा, रंग-रोंगन पर खर्च कहां हुआ? समाज के पैसे से लालकिला बने, चार मीनार बने, अरबों के मंदिर बने। इतिहास गवाह है कि देश का धन उत्पादन प्रक्रिया में लगाने के बजाय मुगल-गार्डन बनाने में लगाये। देश के राजे-रजवाड़े और मठाधीशों ने क्या-क्या गुल नहीं खिलाये अतीत में। बाबा साहेब अम्बेडकर स्मारक का विरोध करने वाले वर्ग का चेहरा बेनकाव हो चुका है। दलित अपने स्वाभिमान की लड़ाई को जारी रखेगा। उसे रोटी भी चाहिऐ और इज्जत भी। अगड़े-पिछड़े के बीच भाईचारा हो पर ‘भाई’ वह बने और ‘चारा’ हम बनें, यह खेल कबतक चलेगा। श्री सिंह ने आगे कहा कि हमने सदियों का शासन मांगा पर हमारे तीन साल की सत्ता को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है। जिन पाटियों के आजादी के बाद शासन अपने पास रखा और देश को बेच डाला, जबाब तो उसको देना है। देश को बहुराष्ट्रीय निगमों के हाथों नीलाम करने वाली पार्टी को कौन नहीं जानता है। उन्होंने कहा कि मायावती की सत्ता न केवल यूपी में बहाल रहेगी बल्कि अन्य प्रान्तों में भी सांगठनिक फैलाव होगा।


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