सावधान! साधु हिंसक हो रहे हैं..



साधुओं का छिनाल होना, अकूत सम्पत्ति जमा करना, सत्ता को हिलाना-डुलाना और दलाली की खबरें सामने आती रहीं हैं। कुछ तो संगीन अपराध में जेल में बंद हैं। अनियंत्रित भोग के लिए योगी बने महात्मा अब हिंसक भी हो उठे हैं। बेवकूफ हिन्दू समाज इन पाखंडियों के चक्कर में बेवजह जान गवां रहे हैं।
हरिद्वार में लाखों हिन्दुओं का जमघट। शायद स्वर्ग पाने और दिलाने की अफरातफरी। स्वर्ग के दलाल साधुओं का लगा यह कुंभ बाजार बुधवार को भारी तबाही और अराजकता का केन्द्र बना रहा। मौका था शाही स्नान का। शक्ति और भक्ति दिखाने की होड़ में साधु और श्रद्धालू आपस में भिड़ गये। उदण्ड साधु ने एक आदमी को कुचल दिया। आदमी इनके लिए कीड़े मकोड़े से भी बदतर थे। पुल पर भारी भीड़ के बावजूद बाबा अपनी गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। आखिर इन्हे बादशाही-स्नान के लिए जो जाना था। साधुओं ने अपने ही श्रद्धालुओं को इस तरह कुचल दिया, मानो कोई हाथी पगला गये हों।
जूनागढ़ अखाड़ा के महामडंलेश्‍वर पायलट बाबा की गाड़ी ने ही अपने भक्त को डायरेक्ट स्वर्ग भेज दिया। जिस वक्त यह घटना घटी थी, उस वक्त हरकी पौड़ी की ओर से आने वालों का तांता लगा था। लाखों लोग चंडीघाट, शंकराचार्य चौक, शिवमूर्ति अपर रोड में जमा थे, पर निरंकुश नागाओं की मनमानी के कारण सात लोगों की जान चली गई।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्‍यक्ष महंत ज्ञानदास ने भी पायलट बाबा को दोषी करार दिया।
आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया है। साधु गलत या श्रद्धालु सही, मामला इसका नही है। मामला है साधुओं, सन्यासियों के बढ़ते अधार्मिक सरोकारों का?
साधुओं का नाम सुनकर काम, क्रोध, लोभ, मोह से दूर होने का जो बिम्ब उभरता था, वह अब खत्म हो गया। सुशील, विनम्र, करूणा, प्रेम, मैत्री यह सब साधुओं के लिए बकवास है।
चंद्रास्वामी, आसाराम, भीमानंद, विजयेन्द्र सरस्वती कृपालु आदि की कहानियां हम रोज पढ़ते सुनते हैं।
सम्पत्ति, शोहरत के खेल में ये साधु अब हिंसा का सहारा लेने लग गये हैं। मठ-मंदिरों के नाम बेनामी सम्पत्तियों पर कब्जा के खेल में यह दुनिया और ही बदनाम होगी।
वक्त रहते समाज को ऐसे पाखंडियों के खिलाफ हस्तक्षेप करना चाहिये। बहिष्‍कार करने की हिम्मत जुटानी चाहिये। शायद समाज के धार्मिक होने की पहली शर्त यही होगी।

- Vijayendra
Editor
Nirman Samvad

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