देह व्‍यापार की दारुण दास्‍तान


‘बड़े भाग मानुष तन पावा’ में गोस्वामी तुलसीदास देह की महिमा का बखान करते हैं. इस दुर्लभ देह के लिए देवता भी लालायित रहते हैं. तुलसीदास किसी स्त्री-देह या अन्य देह की बात नहीं कर रहे हैं. इस देह की दुर्लभता पर तुलसीदास ही नहीं बल्कि व्यापार भी कई अर्थगीत लेकर सामने आया. पहले दैहिक सुखों के लिए बाजार आवश्यक था, अब बाजार के लिए देह आवश्यक हो गयी है.
अब देह, बाजार में है. बाजार देह का मनचाहा इस्तेमाल कर रहा है. विज्ञापनों में, स्वागत में, हर ओर देह ही देह है. देह के बिना ना कोई विज्ञापन आगे बढ़ रहा है, ना ही तकनीक. आज हम देह-युग में जीने को अभिशप्त हैं. इसी देह-बोध से यह युग-धर्म संचालित है. धर्म हो या अर्थ, देह के बिना ना तो कोई मोक्ष देखता है, ना ही कोई दिखाता है.
देह को लेकर सदियों से संघर्ष होता आ रहा है. जमीन कम, जोरू के लिए ज्यादा ही जंग लड़े गए इस जगत में.
मेरे इस देह-गीत का लय केवल स्त्री-देह से जुड़ा हुआ नहीं है. आज देह-व्यापार का मायना बदल गया है. वेश्या यानि सिर्फ स्त्री नहीं, अब तो पुरुषों ने भी इस क्षेत्र में दखल दे दिया है. पुरुष वेश्या या वेश्या...
देह-व्यापार पुनः नैतिक-अनैतिक, वैध-अवैध के विमर्श से बाहर निकल, एक नयी परिभाषा गढ़ रहा है.
इसी देह-बल पर साम्राज्यवाद आगे बढ़ा. साम्राज्य और संसाधन का विस्तार बाहु-बल के बिना कैसे संभव था? भौगोलिक साम्राज्यवाद के विस्तार का आधार था ही देह-बल. इसे नकारना तब भी संभव नहीं था.
आज आर्थिक साम्राज्यवाद का दौर है. इस दौड़ ने अराजक-भोग की ओर मानवी सभ्यता को धकेल दिया. यह मानवी-सभ्यता अनैतिकता और अवैधानिकता की दीवार तोड़ डालने की स्थिति में पहुँच गयी है. वेश्या, स्त्री हो या पुरुष सभी देह बेच रहे हैं. केवल बिपाशा ही नहीं सलमान, जॉन और अन्य खान की भी देह उघड़ रही है. इनकी नंगी होती छाती बाजार को बल प्रदान करने में लगी है. सौन्दर्य बेंचें या शरीर, सभी वेश्यावृत्ति का ही हिस्सा तो है. जिस द्रौपदी को दुशासन निर्वस्त्र नहीं कर सका, वह काम तो महज एक साबुन की टिकिया ‘लिरिल’ कर दे रहा है.
सोचना यही है कि इस देह का क्या करना है? इसे बाबु जी की सेवा में लगाया जाय, बाबा की भक्ति में झोंका जाए, बाजार के हवाले किया जाय या फिर विज्ञापन की उघड़ती दुनिया के वश में कर दिया जाय?
वैसे संस्कृति, सभ्यता, समाज, परिवार के नाम पर देह का खुदरा व्यापार तो हो ही रहा है. निजाम कल का हो या आज का, इनका इंतजाम बिना स्त्री-देह के कैसे पूरा हो सकता है? चाहे नाम जो हो, देह का इस्तेमाल जारी है. तवायफ का डायलॉग याद है ना? घोषित और अघोषित, हर स्त्री वेश्या की ही तरह है. असुरक्षा और मजबूरियों के बीच स्त्री की इच्छा और अनिच्छा का स्पेस ही कहाँ है?
बाजार में पुरुष दर पुरुष की यात्रा में लहूलुहान जिंदगी के भीतर की दास्ताँ क्या है? कौन इसे पढ़ना चाहेगा? कौन इनके जख्मों को सहलाएगा?
शायद कोई नहीं.....


-Vijayendra
Editor

Nirman Samvad

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