..इसके बाद भी वह पत्थर ही तोड़ेगी!


खूब हो-हल्ला मचा, सदन 12 बजे तक स्थगित, फिर छीना झपटी, सदन 2 बजे तक स्थगित। फिर वही बेहयाई और सदन 3 बजे तक स्थगित। बिल पर चर्चा शाम 6 बजे के बाद।... और फिर ‘विधेयक पर चर्चा कल’ की हृदयाघाती सूचना। शाम तक स्थगन और निर्लज्जता के इतने मामले बने कि रात 8 बजे के बारे में सोचकर डर-सा होने लगा, समय का नहीं, संख्या का।
आप सोच रहे होंगे कि भला 8 बजने का कैसा डर? अरे भाई! इस साल आठ मार्च बड़ा खास होने वाला था। महिलाओं को कई तोहफे मिलने का योग था। सरकार की ओर से तो 33 फीसदी महिला आरक्षण के तोहफे की तैयारी थी ही, बाकी दुनिया से भी तोहफों की भरपूर तैयारी हुई पड़ी थी। पक्का वादा था झोलियां भर देने का। नारी के बहाने सबसे ज्यादा कमाने वाला मीडिया-बाजार भी भला कब चूकता है ऐसे मौकों पर। इमेजिन चैनल ने भी ऐसा ही एक तोहफा देने की तैयारी कर ली थी। कई दिनों से विज्ञापन चल रहा था; आठ मार्च को रात आठ बजे ‘काशी’ और साढ़े आठ बजे ‘जमुनिया’ सीरियल की शुरूआत होनी थी।
नारी को लेकर भले ही स्तरीय चिन्तन न किया हो मैंने, लेकिन सशक्त नारियों को लेकर गाहे-बगाहे मनन तो करता ही रहता हूं।
इसी कारण से मैं भी सुबह से तोहफों के इन्तजार में आंखे बिछाकर बैठा था।
इंतजार लम्बा...और लम्बा होता गया, लेकिन तोहफे का देना-ना देना पल-दर-पल एक बड़ा मुद्दा बनता चला गया। लालू-शरद-मुलायम की तिकड़ी तोहफे की नीति-नीयत पर मामले को अटकाये रही। कोई कहता कि इससे उस वंचित तबके को कोई लाभ नहीं होने वाला, जिसके लिए ये जंग जारी है, तो कोई कहता कि आखिर 33 फीसदी का कैसा गणित? देना ही है तो 50 फीसदी आरक्षण दीजिए, आखिर मामला आधी आबादी का है।
कोई इन राजनीतिक पार्टीबाजों से ये सवाल पूछे कि आखिर किस पार्टी ने अपने आन्तरिक संविधान में 33 फीसदी आरक्षण दिया है महिलाओं को? किसने चुनावों में अपनी पार्टी के स्तर से इस पर पहल करने की कोशिश की? लालू जी से कोई पूछे तो सही कि आज वह सदन में इस तरह का सनसनीखेज हंगामा तो मचा रहें हैं, लेकिन इनकी दलितों से जुड़ी हुई सारी संवेदनाएं उस वक्त कहां चली गई थीं, जब चारा घोटाले में फंसने के बाद इन्होंने ‘मुख्यमंत्री-बिहार’ के पद पर अपने उत्तराधिकारी के रूप में राबड़ी देवी को बिठाया था। तब तो ये अपने घर के बाहर झाँक ही नहीं पाये, तो अब भला इनकी बात पर क्या भरोसा किया जाये। जब मामला प्रयोग का होता है, तब तो उन्हें किसी अवर्ण-सवर्ण महिला की याद नहीं आती। उस वक्त तो अपना घर ही सबसे ज्यादा पददलित लगता है इन्हें। मामला तैंतीस फीसदी-पचास फीसदी आरक्षण का कतई नहीं है, मामला है तो सिर्फ सौ फीसदी राजनीति का। कांग्रेस सोनिया को सर्वोच्च और सर्वश्रेष्‍ठ महिला हितचिंतक दिखाना चाहती थी, नतीजतन महिला दिवस के दिन विधेयक लाकर बाजी खेल ली। अब बारी बाकी लोगों की है, सो वो खेल रहे है।
सरकार बजट पर किसी लालू-मुलायम की चिंता नहीं करती दिखती, तब फिर इस विधेयक पर इन दस-बीस के विरोधों से क्या होता। सत्य तो यही है कि खेल बाजार का है, संसद मैदान है और स्त्री खिलौना।
इन सब में, सब अपने-अपने हिस्से का खेल रहे हैं। सोनिया को धन्यवाद देने से लेकर यादव-त्रयी को गालियां देने तक का हर स्वांग किया गया है। विधेयक की अनिश्चितता पर सब निश्चिंत थे। तेरी कमीज, मेरी कमीज से सफेद क्यों? बेहतर है कीचड़ फेंककर बराबर हो लिया जाय। शाम तक इन्हीं अनिश्चितताओं और सबसे खास तोहफे के साथ हुए इस छलात्कार के खेल को देखकर ही मैं रात आठ बजे वाले तोहफे को लेकर भी संशय में पड़ गया था। शुक्र है, इमेजिन चैनल ने अपना वादा निभा दिया। नेतृत्वकारी महिला शक्ति को कोई तोहफा मिला हो या न मिला हो, इमेजिन ने मध्यम वर्गीय महिला को एक तोहफा दे दिया है। अब रात आठ से नौ पर हर घर में नई चर्चा हुआ करेगी ‘काशी’ और ‘जमुनिया’ को लेकर। जैसे ‘अ’ से आनन्दी था, अब कुछ दिन ‘क’ से काशी चलेगा।
9 तारीख की शाम होते-होते विधेयक भी एकमात्र विरोधी मत के साथ राज्य सभा में पारित हो गया। अब गेंद दूसरे कोर्ट में है। इन सब में, सबसे दीगर बात यही है कि संसद से लेकर सड़क तक कुछ भी हुआ हो, लेकिन इस सबसे ‘निराला’ की कविता की उस नायिका पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है, जिसे उन्होंने इलाहबाद के पथ पर पत्थर तोड़ते देखा था। वह इसके बाद भी पत्थर ही तोड़ेगी।

Amit Tiwari
News Editor

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