भगवाधारियों का बढ़ता भोग-बाज़ार...



इच्छाधारी नाग को फिल्मों में अक्सर देखा। इस इच्छाधारी नाग के फांस में अभिनेत्रियों को फंसते देखा। फिल्मी इच्छाधारी उस नाग के सुख-भोग को देखकर मेरा मन अक्सर उद्वेलित होता। रंग रसिया, मन बसिया.....।
खैर, इच्छाधारी नाग की चर्चा करने यहां मैं नहीं बैठा हूं। मैं इस इच्छाधारी भीमांनद की बात कर रहा हूं। जिसके कई नाम होते हैं, उसके कई चेहरे होते हैं। शिवमूरत द्विवेदी उर्फ इच्छाधारी संत उर्फ चित्रकूट वाले बाबा उर्फ भीमानंद अब जाकर फंसे हैं। मकोका लग गया है। ऐसे शातिर व्यक्ति को धर्म जगत से अधर्म जगत (जेल) भेज दिया गया है। पर बात कुछ ऐसी है कि भीमानंद मुझे बहुत पंसद है। बंदा नाचता बढ़िया है। डान्स का स्टेप जबर्दस्त। मीडिया लगातार उसके डांस फुटेज को दिखा रहा है। भीमानंद जैसे बाबाओं को लेकर एक ‘रियलिटी शो’ करने की मेरी भी इच्छा बलवती हो गयी है। ‘‘डांस बाबा डांस’’, ‘‘डांस इंडिया डांस’’ का बेहतर मुकाबला करेगा। ऐसे कई नथुनियों पर गोली मारने वाले बाबाओं की सूची तैयार करने में लगा हूं।
भीमानंद! क्या गुनाह किया कि लुट गये? भीमानंद का इतना ही अपराध है कि वह पकड़ा गया। काबुल में गधे ही नहीं, कुछ अच्छे भी होते हैं। पर यहां तो अधिकांश बाबा भीमानंद के बाप हैं। ये अभी तक अच्छे इसलिए बने है कि पकड़े नहीं गए हैं।
39 वर्षीय इच्छाधारी संत स्वामी भीमानंद जी महाराज पर मकोका लगाया गया। एक ने कहा कि इन्हें जेल-योग लिखा था। जितने दिनों का मिलन-योग था, पूरा हुआ..........। यह भी मेरा लंगोटिया बाबा है, यार है। भीमानंद को अब बेल नहीं मिलेगा। भीमानंद पर आरोप है- सैक्स-रैकेट चलाने का, सम्पत्ति जमा करने का, अपहरण करने का, आस्था से खिलवाड़ करने आदि का......।
कानून यह न समझे कि उसने अपना काम पूरा कर दिया। तेरह-चैदह वर्षों से यह धंधा लगातार चल रहा था। इन वर्षों में बनी हुई भीमानंद की उन तमाम सहयोगी ताकतों को भी चिन्हित करना चाहिये, जिन्होंने इस ‘द्विवेदी’ को देवता बनाया। क्यों बना रहा वह इतने वर्षों तक समाज का देवता? क्या समाज अंधा था? क्या इनके शार्गिदों का अपराध कुछ भी नहीं हैं? समाज की मोक्ष पाने की भूख इतनी क्यों बढ़ गई? उभरता मध्यवर्ग अपनी बहाल सुविधा को बरकरार रखने के लिए बैचेन जो है। समाज की यही बेचैनी तो भीमानंद जैसों को जन्म देती रही है।
अस्तेय, अपरिग्रह की बात करने वाला न तो संत रहा, न ही समाज। कबीर, सूत कातते, कपड़ा बीनते 'संत कबीर' हो गये। पर, आज के इन बाबाओं को पसीना बहाने की जरूरत ही क्या है? संत की परिभाषा कहां है? कौन है इसका उदाहरण? संत कहते ही जो छवि बनती है, वह है राग-द्वेष, लोभ, मोह, क्रोध तथा विषय-वासना से दूर एक ऐसे व्यक्ति की, जो जीव, जगत् और जगदीश में अन्तर्सबंधों को समझने और समझाने वाला है। जीवन कैसे बेहतर बने? जीवन का आदर्श क्या हो? इन तमाम प्रश्‍नों का उत्तर संत के व्यक्तित्व से ही मिल जाता है।
इच्छाधारी संत भीमानंद केवल परिणाम नहीं है, यह एक प्रक्रिया है। आश्रम फाइवस्टार होटल का रूप ले चुका है। सत्संग, भक्त-प्रबंधन बन चुका है। शिष्‍य अब ‘सेटर’ बन गया है। दीक्षा के लिए डॉलर चाहिये। दान में ‘देह’ चाहिये।
बाबा भी मर्द होते हैं। इनके भी लिंग हैं, उत्थान हैं एवं पतन है। अगर नहीं है, तो बाबा नपुंसक ही जाने जायेंगे। हिन्दुओं को गर्व हो या ना हो, पर हिन्दूवादी संगठनों को तो गर्व हो ही रहा होगा अपने बाबाओं की मर्दानगी पर!
देश की जनता इस भ्रम में न रहे कि कौन बाबा कितना बढ़िया? मामला विकल्प का नहीं विचार और विश्‍वास का है। हम समाज-निर्माण में आस्था क्यों नहीं रखते। हम गरीब की झोपड़ी में ईंट क्यों नहीं जोड़ते और बुझे हुए चूल्हों को जलाने के लिए चंदा क्यों नहीं देते?
साल भर तौल कम और सावन में बोलबम.........। हम बगल के भूखे प्यासे का भोजन तो क्या पानी के लिए भी नहीं पूछते, पर इन बेहूदे बाबाओं को पैसा देने, प्रतिष्‍ठा देने में पीछे नहीं रहते हैं। बाबाओं के पास गिड़गिड़ाने की हमारी ऐसी मजबूरी क्यों? जब तक समाज में बेईमान लोग रहेंगे, ये बाबा कभी नही मरेंगे। हमारी चाहत की कोख से न जाने कितने भीमानंद पैदा हुए हैं और होंगे। उन्हें मकोका नहीं रोक पायेगा?
बाजार की वैश्‍या इन बाबाओं से अच्छी है। वेश्‍या सत्य का सामना करती है। जैसा करती है, वैसा ही दिखती है। वह सत्य को अपने पक्ष में करने के लिए तर्क नहीं खोजती, वह सत्य के ही साथ होकर जीती है।
मनुष्‍य-विरोधी इन महात्माओं का चरित्र है ही काल-गर्ल जैसा? करनी कुछ और दिखावा कुछ और?
सियासी शिकंजे से बात नहीं बनेगी। समाज को आगे आना होगा और स्वर्ग की बजाय समाज की ही बात करनी होगी। दो कौड़ी के इनके कथित मोक्ष को हम इन बाबाओं को वापस कर दें। बस, इनका बाजार बंद हो जाएगा।
स्वर्ग की सीढ़ी, भजन की सीडी, रुद्राक्ष बेचना, पत्थर से भाग्य बदलना, कौन सिखा रहा है? इस मीडिया के पास कोई नैतिक आधार नहीं है भीमानंद जैसों को उछालने का? तकनीकी विकास के इस चरम पर जिस तरह से मीडिया अंधविश्‍वास परोस रहा है वह भी कम चिंता का विषय नहीं है।
तरह-तरह की दलाली करने वाले इन दगाबाज़ बाबाओं के खिलाफ समाज एक सशक्त मुहिम चलाए, तो समाज के साधुओं एवं संतो द्वारा भी इस मुहिम का स्वागत ही होगा।

- Vijayendra
Editor

Category:
Reactions: 

0 comments:

Post a Comment