राहुल को महान बनने के लिए और कितने दलितों की जरूरत है



भारतीय राजनीति में ‘युवराज’ का पदार्पण हो चुका है. राज्याभिषेक की तैयारी है. मीडिया जब कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग कर रहा होता है, तब शायद वह भूल जाता है कि भारत में राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है. वह भूल रहा होता है कि वह लोकतंत्र को कलंकित कर रहा है.
जहाँ एक ओर हम यह सोचकर खुश हो रहे होते हैं कि भारत में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है, वहीं दूसरी ओर परिवारवाद की गहरी जडें कुछ और ही आभास दे रही होती हैं. ‘राजा का बेटा राजा’ की परिपाटी पर चल रही परिवारवाद की राजनीति राजतन्त्र की सोच में जकड़े समाज की ओर इशारा करती है. ९० के दशक से छोटे दलों की बढ़ती संख्या और फिर उनकी सफलता ने परिवारवाद को मजबूती प्रदान की. हर दल का नेतृत्व अपने उत्तराधिकारी की तलाश अपने परिवार में करने लगा है. और यह उत्तराधिकार किसी योग्यता के आधार पर हस्तांतरित नहीं होते हैं, बल्कि इनके पीछे मात्र अकूत धन और सत्ता की शक्ति का लोभ ही काम कर रहा होता है.
नेहरु परिवार ने हमेशा से ही राजनीति और सत्ता को अपने लिए आरक्षित किया हुआ है. और राहुल गाँधी के बाद से एक बार फिर सिद्ध हो चुका है कि नेता भी बनाये जा सकते हैं. आखिर जब कम्प्यूटर असेम्बल हो सकते हैं तो फिर नेता क्यों नहीं! आज नेता भी फर्नीचर की तरह गढ़े जा सकते हैं!
१९ जून १९७० को जन्मे राहुल गाँधी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और सोनिया गाँधी के पुत्र हैं. तमाम मतभेदों के साथ यह कहा जाता है कि उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी काॅलेज के ‘विकास अध्ययन’ विभाग से एम.फिल किया है. हम इस पर कोई प्रश्न नहीं करना चाहते हैं. लेकिन आज जिस तरह से राहुल को देश के सबसे योग्य युवा नेता के रूप में गढ़ने का प्रयास किया जा रहा है वह विचारणीय है. राहुल के बहाने एक बार फिर यह सिद्ध हो चुका है कि भारतीय राजनीति में सफलता आपकी जमीनी क्षमता, कर्मठता और कार्यकुशलता से नहीं बल्कि आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और रणनीतिक कौशल से मिलती है.
आज भारतीय राजनीति में मुख्यतः चार ही गाँधी बचे हैं- मेनका गाँधी, वरुण गाँधी, सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी. दो गाँधी सत्ता पक्ष में हैं और दो विपक्ष में. राहुल और वरुण दोनों ही चर्चा में हैं. दोनों के पीछे उनकी मांएं एक कुशल रणनीतिकार की तरह लगी हुई हैं. और सबसे बड़ा सच तो यही है कि ये दोनों ही गाँधी मिलकर असली गाँधी को खत्म कर रहे हैं. एक गाँधी गीता के नाम पर हाथ काट डालने को तैयार है, और दूसरा गाँधी सादगी को श्रृंगार बनाकर घूम रहा है. एक गाँधी वैमनस्य का बीज बो रहा है और दूसरा दलित प्रेम का स्वांग रचकर उस असली गाँधी का असली वारिस होने का दंभ पाले उसकी ही हत्या करने पर लगा हुआ है. दोनों ही गाँधी असली गाँधी को खत्म कर रहे हैं. हालाँकि राहुल की चर्चा ज्यादा है, कारण कि वह गाँधी की दिशा में चलकर ही गाँधी को खत्म कर रहे हैं.
आज राहुल गाँधी की सादगी चर्चा में है. राहुल गाँधी बहुत सादगीपूर्ण तरीके से रहते हैं. अरे भैया सादगी सेलिब्रेशन का सब्जेक्ट कैसे बन गयी? सादगी तो गाँधी की थी. गाँधी जो कहते थे वही करते थे और जो करते थे वही कहते थे. लेकिन राहुल गाँधी सादगी का स्वांग करते हैं. मीडिया परेशान है कि राहुल गाँधी कोई पद क्यों नहीं ले रहे हैं! लेकिन ये देखने की कोशिश किसी की भी नहीं है कि भारतीय राजनीति में पहली बार कोई प्रधानमंत्री से भी अधिक शक्तिशाली बनकर उभरा है. जो कंपनी का सीइओ है, उससे आप किसी का मातहत बनने की अपेक्षा क्यों पाले हुए हैं? जब राहुल बिना किसी पद के ही सर्वोच्च हैं, तब फिर भला पद ग्रहण करने की आवश्यकता कहाँ रह जाती है. और फिर जब बनेंगे तब प्रधानमंत्री ही बनेंगे, कोई मातहत क्यों बने, आखिर गाँधी परिवार की औलाद होने के नाते पहला हक तो उनका ही बनता है ना इस पद पर!!
मैं राहुल से प्रश्न करना चाहता हूँ कि आखिर इस स्वांग से क्या लाभ? माना कि इससे उनके राजनीतिक भविष्य को बहुत लाभ है, लेकिन उनके तथाकथित दलित प्रेम से दलितों का कितना भला होने वाला है, ये भी कोई बताएगा.
राहुल उसी पार्टी के मुखिया हैं, जिसकी सरकार तमाम गरीब विरोधी योजनायें आये दिन लागू कर रही है. महंगाई २०० प्रतिशत तक बढ़ गयी है, राहुल हेलिकाॅप्टर का तेल फूंककर दलित की बस्ती में चक्कर काट रहे हैं. एक तरफ राहुल गरीबों के भले की बात कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ उन्हीं की पार्टी की सरकार नक्सल प्रभावित इलाकों में ग्रीन हंट करके उन गरीबों का शिकार कर लेना चाहती है जिनकी उपस्थिति बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित के विरुद्ध है. एक ओर राहुल महान बनने के लिए गरीबी के आंकड़े गिना रहे हैं, तो दूसरी ओर उनकी सरकार गरीब हटाओ योजना में लगी हुई है. २०१० के कॉमन वेल्थ खेलों के नाम पर दिल्ली से गरीब खदेड़े जा रहे हैं, राहुल युवा संगठन बनाने में लगे हैं.
मैं पूछना चाहता हूँ कि आखिर राहुल की राजनीति चमकाने के लिए और कितने दलितों की जरूरत है. क्योंकि राहुल की योजनाओं से स्पष्ट है कि वह दलित प्रेम दिखाकर ही महान बने रह सकते हैं, वह गरीब के घर में खाना खाने का स्वांग करके ही अच्छे और जमीन से जुड़े नेता होने का प्रमाणपत्र पाना चाहते हैं. किसी एक कलावती का नाम बोलकर वह संसद में श्रेष्ठ हो जाना चाहते हैं. उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि ऐसी कलावतियों की गिनती दो-चार या दस में नहीं, करोंड़ों में है.
विकास के टापू से खदेड़े जा रहे गरीब किसान, मजदूर, दलितों को लेकर क्या योजना है राहुल के पास? कितना जमीनी अनुभव है राहुल के पास देश की स्थिति को लेकर? कहा जा रहा है कि राहुल एक दम से नहीं थोपे जा रहे हैं, बल्कि वो चार वर्षों से प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं. क्या भारतीय राजनीति में अनुभवी युवाओं का अकाल पड़ गया है?
राहुल युवा हैं. मैं जानना चाहूँगा कि कितने युवाओं की कितनी समस्याओं से अवगत हैं राहुल अपने देश के अन्दर? राहुल की राजनीति दलितों की बस्तियों की संख्या पर निर्भर होकर रह गयी है. सोचने और विचारने का प्रश्न यह है कि बुंदेलखंड के जिस गाँव में राहुल गाँधी तीन साल पहले गए थे, और जहाँ गत 21 दिसंबर को फिर से एक दलित परिवार में रूककर आये, वहां इन तीन सालों में परिवर्तन क्या हुआ? उस गाँव में कौन सी विकास की बयार बहा दी राहुल के तथाकथित दलित प्रेम ने? क्या लाभ हुआ उस गाँव के युवाओं को आपकी यात्राओं का? उन युवाओं के रोजगार के लिए क्या योजना है आपके पास?
आखिर राहुल की इस बात का क्या अर्थ रह जाता है कि देश में ५० करोंड़ लोग दैनिक २० रूपये से भी कम में जीवन यापन करने को मजबूर हैं. अरे भाई जब आपको पता है कि स्थिति ऐसी और इतनी शोचनीय है, तब फिर आप अपने प्रधानमंत्री के साथ बैठकर उनकी समस्या के समाधान के लिए उपाय क्यों नहीं करना चाहते? तमाम गरीब विरोधी योजनायें तो आपकी सरकार ही चला रही है ना.
राहुल के इस खोखले दलित प्रेम से दलितों का कोई भला नहीं होने वाला है. राहुल को अगर इतनी ही चिंता है, तो दलितों के बीच में जाकर उनका खाना खाने की बजाय प्रधानमंत्री के साथ बैठकर उन नीतियों पर चर्चा करें जो उन दलितों की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं.
सादगी का स्वांग रचकर कोई गाँधी नहीं बन सकता. गाँधी ने गरीबों को देखा नहीं नहीं था, बल्कि उनकी गरीबी को जिया था.
उजला धप्प कुरता पहनकर, हेलिकाॅप्टर में बैठकर दलित प्रेम दिखा देने से राहुल, ‘गाँधी’ नहीं बन जायेंगे.
Amit Tiwari
News Editor
Nirman Samvad

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2 comments:

Raghav said...

You are right Mr. writer. But what kind of democracy in India. Democracy Is Govt. of fool. I think Rajtantra is better than democracy. At least King was only the responsible person of all kind of problem like corruption, terrorism, scam.

Anonymous said...

दलितों की बस्तियों में स्वयं घोषित उच्च जातियों के जाने को दलितों ने हमेशा पाखंड माना है। मामला चाहे मोहनदास कर्मंचंद गांधी का हो या राहूल गांधी का। डा. आंबेडकर मोहनदास कर्मचंद गांधी के कथित दलित प्रेम के हमेशा विरोधी थे। डा. आंबेडकर का मानना था का मोहनदास करमचंद गांधी दलित को करूणा और सहानुभूति का पात्र बना रहे हैं। वैसे भी मोहनदास करमचंद गांधी मनुवादी वर्ण व्यवस्था को आदर्श व्यवस्था मानकर इसके समाज के हित में मानते थे।

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